आगरा। डा. आरएस पारीक के पद्मश्री से सम्मानित होने पर ताज नगरी के लोगों में खुशी की लहर है।
वह 70 साल से होम्योपैथी पद्धति से मरीजों का इलाज कर रहे हैं। मूलरूप से राजस्थान के नवलगढ़ के रहने वाले डा. आरएस पारीक ने 21 वर्ष में बेलनगंज में एक छोटे क्लीनिक से होम्योपैथिक पद्धति से मरीजों का इलाज करना शुरू किया। उस समय होम्योपैथी को लोग जानते नहीं थे, चर्म रोग सहित कई बीमारियों में एलोपैथी कारगर साबित नहीं हुई तो मरीजों ने उनसे इलाज कराया। 1956 में उन्होंने रॉयल कॉलेज ऑफ लंदन से ग्रेजुएशन करने के बाद पारीक होम्योपैथिक रिसर्च सेंटर स्थापित किया। तब वो पानी के जहाज से इंग्लैंड गए थे, जो उस समय बड़ी बात हुआ करती थी। देश-विदेश के मरीजों का इलाज शुरू किया। उनके सेंटर पर मरीजों की संख्या अधिक होने के कारण कैंसर, चर्म रोग सहित गंभीर और सामान्य बीमारियों पर शोध करना शुरू किया। केस स्टडी को विदेशों में होने वाली कार्यशालाओं में प्रस्तुति किया। इससे दुनिया भर में भारतीय होम्योपैथी पद्धति को अलग पहचान मिली और विदेश से डॉक्टर प्रशिक्षण लेने के लिए उनके सेंटर पर आने लगे। उनके बेटे डा. आलोक पारीक भी होम्योपैथिक चिकित्सक हैं और यश भारती से सम्मानित हो चुके हैं। डा. राजू पारीक सर्जन हैं और उनके पौत्र डा. प्रशांत पारीक सर्जन और डा. आदित्य पारीक भी होम्योपैथिक चिकित्सक हैं।











