आगरा। भाजपा सांसद एवं फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के कथित ‘गटर जेनरेशन’ बयान को लेकर दायर परिवाद को विशेष न्यायालय एमपी-एमएलए के न्यायाधीश अनुज कुमार सिंह ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि परिवादी इस घटना का न तो पीड़ित है और न ही उससे सीधे तौर पर प्रभावित व्यक्ति। अदालत ने यह भी माना कि परिवाद में लगाए गए आरोपों को सही मान भी लिया जाए, तब भी भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत अपराध के लिए जरूरी कानूनी आधार पूरे नहीं होते।
राजीव गांधी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने 11 अगस्त 2026 को अदालत में परिवाद प्रस्तुत किया था। परिवाद में कहा गया था कि 20 जुलाई 2026 को पेपर लीक के विरोध में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया था। इस घटना को लेकर कंगना रनौत ने 27 जुलाई 2026 को कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों के संबंध में ‘गटर जेनरेशन’ शब्द का इस्तेमाल किया था। परिवादी ने आरोप लगाया था कि इस टिप्पणी से छात्र-छात्राओं के साथ उनके अभिभावकों का भी अपमान हुआ। मामले को लेकर न्यायालय में सुनवाई चल रही थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि परिवादी की ओर से वर्णित घटना में वह स्वयं पीड़ित या व्यथित व्यक्ति नहीं है। इसलिए उसके पास परिवाद प्रस्तुत करने का विधिक अधिकार नहीं है। अदालत के अनुसार परिवाद में वर्णित तथ्यों को पूर्ण रूप से सत्य मानने पर भी धारा 152, 356, 196, 197, 299 और 352 भारतीय न्याय संहिता तथा धारा 66 आईटी एक्ट के तहत अपराध के आवश्यक घटक पूरे नहीं होते। अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 152, 196, 197 और 299 के तहत संज्ञान के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 217 के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। वहीं धारा 356 के संबंध में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 222 के तहत परिवाद व्यथित व्यक्ति द्वारा ही पोषणीय है। अदालत ने टिप्पणी की कि कथित बयान किसी निश्चित और पहचान योग्य निकाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक अनिश्चित और विशाल जनसमुदाय के प्रति था। इसलिए इसे मानहानि का आधार नहीं माना जा सकता। अदालत के मुताबिक परिवाद में दिए गए कथनों से कंगना रनौत द्वारा प्रथम दृष्टया कोई अन्य अपराध किया जाना भी परिलक्षित नहीं होता। अदालत ने यह भी माना कि कथित अभिव्यक्ति आपत्तिजनक होने के बावजूद संविधान के अनुच्छेद 19(1) के संरक्षण क्षेत्र में आती है और विधि व्यवस्था के प्रकाश में अपराध नहीं बनती। आदेश में कहा गया कि वादी को परिवाद प्रस्तुत करने का विधिक अधिकार प्राप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में परिवाद दर्ज करना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग और विधि व्यवस्था के प्रतिकूल होगा। इन्हीं आधारों पर परिवाद को पोषणीय न मानते हुए निरस्त कर दिया गया।











