नई दिल्ली। ज्ञानवापी विवाद मामले में जमीयत उलमा-ए-हिंद अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर प्लेसेज आफ वर्शिप एक्ट को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने की मांग की है। जमीयत ने इस मामले में खुद को एक पार्टी बनाने की भी मांग की है। इस मामले में गर्मी की छुट्टी के बाद यानी जुलाई में सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर सकता है। अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दायर की है। वाराणसी का ज्ञानवापी मामला जिला न्यायालय में लंबित है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में एक से अधिक ऐसी याचिकाएं दायर की गई हैं। जिनमें न्यायालय को प्लेसेज आफ वर्शिप एक्ट को असंवैधानिक घोषित करने के लिए कहा गया है।
जमीयत ने इसी याचिका में एक प्रतिवादी के रूप में शामिल होने की मांग की है। अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देते हुए जमीयत ने अधिवक्ता एजाज मकबूल के माध्यम से कहा कि ऐतिहासिक गलतियों को ठीक करने के लिए न्यायिक कार्यवाही का सहारा नहीं लिया जा सकता है। जमीयत ने अयोध्या फैसले का हवाला दिया है। याचिका में कहा गया है कि इस अदालत ने स्पष्ट रूप से माना है कि कानून को अतीत में पहुंचने के लिए एक उपकरण के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और हर उस व्यक्ति को कानूनी उपाय प्रदान नहीं किया जा सकता जो इतिहास की धारा से असहमत है। आज की अदालतें ऐतिहासिक अधिकारों एवं गलतियों का संज्ञान तब तक नहीं ले सकती हैं जब तक यह नहीं दशार्या जाता कि उनके कानूनी परिणाम वर्तमान में लागू करने योग्य हैं।
प्लेसेज आफ वर्शिप एक्ट के प्रावधानों को चुनौती देते हुए एक और याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट में इससे पहले एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय और एक अन्य की ओर से प्लेसेज आफ वर्शिप एक्ट की धारा-2,3,4 को चुनौती दी जा चुकी है और मामले में केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांग रखा है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में कहा गया है कि प्लेसेज आफ वर्शिप एक्ट 1991 के प्रावधान मनमाना है और उसके कटआफ डेट कानून बनाने से पहले की तारीख से लागू किया गया है और वह 15 अगस्त 1947 रखा गया है। एक रिटायर आर्मी आफिसर की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में उक्त एक्ट के प्रावधानों को गैर संवैधानिक घोषित करने की गुहार लगाई गई है।










