आगरा। हरीपर्वत पुलिस हाई कोर्ट के आदेश को भी गंभीरता से नहीं लेती। ऐसा मामला तब सामने आया जब धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं के एक मामले में दर्ज एक एफआईआर को हाई कोर्ट द्वारा निरस्त कर दिये जाने के बावजूद हरीपर्वत थाना पुलिस ने चार्जशीट लगा दी। जिन लोगों के खिलाफ चार्जशीट लगी थी उनके सम्मन जारी होने के बाद पुलिस के कारनामे की जानकारी हुई। कोर्ट के समक्ष मामला पहुंचने के बाद सीजेएम ने नाराज होते हुए मामले में आख्या तलब की है। इधर इससे पहले भी हरी पर्वत थाना पुलिस का एक और कारनामा सामने आ चुका है। एक मृत व्यक्ति के बयान लेकर उसके खिलाफ पुलिस ने चार्जशीट लगा दी थी। सीजेएम के आदेश पर पुलिस कर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था।
अंकित धीर निवासी दयालबाग का अपनी बुआओं के साथ संपत्ति को लेकर पारिवारिक विवाद था। कोर्ट के आदेश पर उनकी बुआओं, फुफ़ाओं और उनके बच्चो सहित 10 लोगों के खिलाफ हरीपर्वत थाने में धोखाधड़ी सहित कई अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था। मामले में हाईकोर्ट में मीडिएशन होने के बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने तीन नवंबर 2024 को हरीपर्वत थाने में दर्ज एफआईआर निरस्त कर दी थी। इसकी कॉपी भी थाने में उपलब्ध करा दी गई। इसके बावजूद हरी पर्वत थाना पुलिस ने फरवरी 2025 में चार्जशीट लगाकर कोर्ट में दाखिल कर दी। चार्जशीट में सभी 10 लोगों के नाम शामिल हैं। हाल ही में उनके घर पर जब कोर्ट से सम्मन पहुंचा तो उन्होंने अपने अधिवक्ता डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित से संपर्क किया। डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित ने पता किया तो पता चला पुलिस ने चार्जशीट लगा दी है, जबकि हाई कोर्ट से एफआईआर को निरस्त कर दिया गया था। उन्होंने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां दलील दी कि आगरा पुलिस का यही हाल है, अगर उसे पैसे नहीं दो तो वह लोगों को फंसा देती है। दरोगा ने पैसे मांगे थे उसे पैसे नहीं दिए थे। इसलिए उसने चार्जशीट लगा दी। उसने हाई कोर्ट के भी आदेश को नहीं माना। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भी यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए। हाई कोर्ट ने एफआईआर को निरस्त किया है और पुलिस ने फिर भी चार्जशीट लगा दी। उन्होंने मामले में थाने से आख्या मांगी है।
एसीपी ने क्या किया पर्यवेक्षण?
किसी भी विवेचना में दरोगा के द्वारा चार्जशीट या एफआर लगाए जाने के बाद इंस्पेक्टर के पास पर्चे सीन होने के लिए जाते हैं। इसके बाद वह उसे पेशी में एसीपी के पास भेज देते हैं। एसीपी उसे पढ़ने के बाद कोर्ट में दाखिल होने के उसे भेज देते हैं। मतलब कि उसका पर्यवेक्षण एसीपी की जिम्मेदारी है। आखिर एसीपी ने क्या पर्यवेक्षण किया। यह भी सवाल भी अधिवक्ता ने कोर्ट में खड़े किए। अधिवक्ता डॉ. दीक्षित का कहना है कि वह हाई कोर्ट में पुलिस के अधिकारियों को भी पार्टी बनाएंगे जिससे भविष्य में वह किसी और के साथ ऐसा ना करें और हाईकोर्ट के आदेश को गंभीरता से लें।











