-गौरव प्रताप सिंह-
आगरा। आगरा कमिश्नरेट की खंदौली थाना पुलिस कितनी होशियार है। इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह मुकदमा दर्ज होने से पहले ही मुलजिम को थाने से जमानत देने के लिए नोटिस तामिल करा लेती है। यह खेल किसी और मामले में नहीं सैनिक के साथ ट्रैक्टर बदलने की गद्दारी वाले मामले में ही हुआ है। मामला डीजीपी तक भी पहुंच गया है। वहीं से ही अब कोई कार्रवाई की उम्मीद है।
नौ मार्च को खंदौली थाना क्षेत्र में एक सैनिक की पत्नी को ट्रैक्टर चालक ने कुचलकर मार दिया था। ट्रैक्टर और चालक को भीड़ और मृतिका के पति और जेठ ने पुलिस के सुपुर्द कर दिया था। खंदौली थाना पुलिस ने ट्रैक्टर को बदल दिया। उसकी जगह दूसरा ट्रैक्टर खड़ा कर दिया। मामले में ट्वीट होने के बाद जांच हुई तो ट्रैक्टर बदले जाने की बात सही पाई गई। मामला सुर्खियों में आने के बाद थानाध्यक्ष की ओर से कांस्टेबल के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया गया, जबकि उनकी भूमिका खुद संदिग्ध थी। इधर सिपाही ने अपना वीडियो वायरल कर अधिकारियों से कहा कि उसे बलि का बकरा बनाया गया है। पूरा खेल थानाध्यक्ष राजीव सोलंकी और गौरव राणा का है। मामला डीजीपी तक पहुंचने के बाद खलबली मची हुई है। डीजीपी ने भी मामले में रिपोर्ट मांगी है। डीजीपी के रिपोर्ट मांगने के बाद जब खुफिया विभाग ने जांच की तो यह सामने आया है कि 9 मार्च को जिस ट्रैक्टर चालक को पुलिस के द्वारा पकड़ा गया था उसे थाने से जमानत देकर छोड़ने वाले नोटिस पर तामिला करा लिया गया। जबकि मुकदमा 11 मार्च को लिखा गया है। मुकदमा बाद में लिखा जा रहा है और जमानत का नोटिस पहले ही तामील कराया जा रहा है। जमानत के नोटिस को जीडी पर भी नहीं अंकित किया गया है। यह इसलिए भी अंकित नहीं हो सकता था जब मुकदमा ही दर्ज नहीं हुआ तो जमानत कैसे दे देंगे। चर्चा है कि नोटिस तामील कराने के पीछे खेल यह रहा होगा कि पुलिस ने सोचा होगा हमने तो अपना खेल कर लिया है, बाद में अगर मुकदमा लिखा जाता है और विवेचना होगी तो इस नोटिस के आधार पर आगे की कार्रवाई कर देंगे। खुफिया विभाग ने अपनी जांच में यह भी पाया है कि जीडी पर ट्रैक्टर का भी दाखिला नहीं किया गया है। ना ही ट्रैक्टर चालक का, जो कि मुलजिम था। इन सभी का दाखिल न होना क्या सिर्फ एक सिपाही कर सकता है। यह सवाल भी खड़े हो रहे हैं। खुफिया विभाग जमानत वाले नोटिस की कॉपी भी अपने साथ ले आया है। इसके बाद भी अभी तक संलिप्त अन्य पुलिसकर्मियों पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है।
सिपाही वाले मुकदमे में एक दिन में कट गया पर्चा, सैनिक वाले में नहीं
विवेचक की बात करें तो 11 तारीख को मुकदमा दर्ज हुआ है और उसके द्वारा पहला पर्चा भी नहीं काटा गया। मामला सुर्खियों में आने के बाद यह काटा गया है जबकि घटना होने वाले दिन ही या अगले दिन पहला पर्चा काटकर पेशी में भेज देना चाहिए था। सिपाही के खिलाफ जब मुकदमा दर्ज हुआ तो धाराएं बढ़ाते हुए पहला पर्चा एक दिन में ही काटकर पेशी में भेज दिया गया। सैनिक की पत्नी को कुचलकर मारने वाले मामले में पहला पर्चा जल्द क्यों नहीं काटा गया। यह सवाल खड़ी हो रहे हैं। इस पर्चे में कोई खास ज्यादा काम भी नहीं था। उन्हें विवेचना ग्रहण करनी थी। इसके बाद नकल चिक, नकल रपट का अवलोकन करना था। इसके बाद fir लेखक के बयान। वादी के बयान और घटनास्थल का निरीक्षण करना था। ट्रैक्टर तो पहले से ही थाने में मौजूद था तो उसके मालिक को बुलाना था उससे कागजात लेने थे। चर्चाएं चल रही हैं कि जिस ट्रैक्टर से पहले हादसा हुआ था वह चोरी का था। अब इसमें कितनी सच्चाई है यह तो जांच होने के बाद ही पता चल सकेगा। यह ट्रैक्टर बरेली का बताया जा रहा है। पुलिस ने चालक से जब जमानत का नोटिस तामिल कराया था तो उससे ट्रैक्टर के कागज क्यों नहीं लिए थे? यह सवाल भी खड़े हो रहे है।
इधर सैनिक की पत्नी को कुचलने वाले वास्तविक ट्रैक्टर की डंपिंग यार्ड में आने की एंट्री है। 10 तारीख की रात को वह गया है उसकी भी एंट्री है। होमगार्ड ने रजिस्टर में एंट्री कर ली थी। होमगार्ड ने यही बताया है उसके पास तो फोन आया था ट्रैक्टर को जाने देना।











