आगरा। आगरा कमिश्नरेट में जिन मुकदमों में वादी पुलिस बन रही है वह मुकदमे किसी और के द्वारा नहीं पुलिस विभाग के ही द्वारा झूठे साबित किया जा रहे हैं। ग्वालियर हाईवे पर इरातदनगर की कुर्राचित्तरपुर चौकी क्षेत्र में एक्सीडेंट के बाद बवाल हुआ था। दरोगा ने मुकदमा लिखाया। 43 लोगों को नामजद किया। इंस्पेक्टर क्राइम को विवेचना मिली। उन्हें घटना के साक्ष्य नहीं मिले। मुकदमे में अंतिम रिपोर्ट लगा दी। इसके बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या दरोगा ने झूठा मुकदमा दर्ज कराया था?
कमिश्नरेट में साक्ष्य आधारित विवेचना प्रणाली लागू है। पीड़ितों द्वारा लिखाए मुकदमों की विवेचना छोड़िए यहां तो पुलिस द्वारा लिखाए मुकदमे की भी धज्जियां उड़ रही हैं। सात अप्रैल 2024 को रोडवेज बस से एक्सीडेंट में एक ग्रामीण की मौत हो गई। ग्रामीणों ने सड़क पर शव रखकर जाम लगाया। थाने में तैनात दरोगा योगेंद्र कुमार ने इस घटनाक्रम के बाद मुकदमा दर्ज कराया। मुकदमा बलवा, मारपीट, गाली-गलौज, पथराव, रास्ता रोकना, सरकारी कार्य में बाधा, लूट का प्रयास, तोड़फोड़ की धारा के तहत लिखा गया था। मुकदमे में 43 ग्रामीण नामजद किए गए थे। मुकदमे में आरोप लगाया गया था कि वीडियो बनाने पर पुलिसकर्मियों से मोबाइल छीनने का प्रयास किया। पुलिस को खदेड़ा। बवाल पर सर्किल का फोर्स आया था। प्रशासनिक अधिकारी मौके पर आए थे। दहशत फैल गई थी। राहगीर वाहनों में छिप गए थे। मुकदमे की विवेचना इंस्पेक्टर क्राइम के पास थी। उन्होंने मुकदमा खत्म कर दिया। अंतिम रिपोर्ट लगा दी है। सवाल यह खड़े हो रहे हैं कि अगर दरोगा ने झूठा मुकदमा लिखाया था तो क्या उन्हें निलंबित किया जाएगा। वहीं अगर मुकदमा सही था तो उसमें इंस्पेक्टर क्राइम ने एफआर कैसे लगा दी? इंस्पेक्टर इरादतनगर भूपेंद्र सिंह बालियान ने बताया कि विवेचक ने मुकदमा खत्म कर दिया है। किसी को आरोपित नहीं बनाया है। अंतिम रिपोर्ट लगाई गई है।











