आगरा। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के पुरातन छात्र प्रकोष्ठ द्वारा ब्रज संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार विषय पर आयोजित कार्यशाला में ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर, ऐतिहासिक दस्तावेजों, प्रकृति संरक्षण तथा परम्परागत ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन पर चर्चा हुई।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय के शिक्षको, पूर्व छात्रों तथा विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। जिन्होनें संरक्षण और संवर्धन के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यशाला में विशेषज्ञ द्वारा महत्वपूर्ण विषयों पर व्याख्यान दिए गए, जिनमें डिजिटल संरक्षण, परम्परा, कला और शिल्प को सहेजने के उपाय तथा जैव विविधता संरक्षण जैसे विषय शामिल रहे। प्रतिभागियों ने संरक्षण के नवीनतम तरीकों और तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की। चार्टर्ड अकाउंटेंट संजीव माहेश्वरी ने कहा कि शिक्षा में ब्रज का समावेश होना चाहिए तथा उसमें भारतीयता की झलक होनी चाहिए। शहर के प्रतिष्ठित डॉ. चंद्रा ने कहा कि ब्रज के लोगों की भाषा में मिठास है। यहां के व्यक्तियों में मेरा अनुभव है कि धार्मिकता ज्यादा है, जिसमें उन लोगों के मर्ज ठीक होने की सम्भावना ज्यादा होती हैI
पुरातन छात्र नंद नंदन गर्ग ने कहा कि कृष्ण की कुटनीति को पाट्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए तथा कीथम वेटलैंड को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करना उचित होगा। डॉ. संजय चतुर्वेदी ने कहा कि ब्रज संस्कृति के प्रचार के लिए यह अवसर है कि मथुरा के लोगों को विश्वविद्यालय प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे।
डॉ. हरनारायण चतुवेर्दी ने कहा कि अब समय आ गया है जब ब्रज के खानपान के बारे में दुनिया को बताया जाए। डॉ.त्रिपाठी ने कहा कि ब्रज आधारित सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना किया जाना चाहिए। पत्रकार राजीव सक्सेना ने कहा कि ब्रज का इतिहास द्वापर युग से नहीं बल्कि त्रेता युग से शुरू होता है। जब श्री राम के भाई शत्रुघ्न ने यहां पर पहली बार 84 कोस की परिक्रमा की थी। डीन प्रोफेसर लवकुश मिश्रा ने कहा कि वर्तमान कुलपति प्रोफेसर आशु रानी ब्रज की संस्कृति को प्रचारित प्रसारित करने के लिए बहुत उत्सुक हैंI











