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भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरीं आम्बेडकर विवि की छठवीं कुलपति हैं प्रो. आशु रानी !

भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरीं आम्बेडकर विवि की छठवीं कुलपति हैं प्रो. आशु रानी !

चार कुलपति की भ्रष्टाचार के मामले में विजिलेंस जांच चल रही, सीबीआई, सीबीसीआईडी, एसटीएफ, विजिलेंस, ईडी सभी दे चुकी विवि में दस्तक

June 8, 2025
in administration, Agra, Corruption, National

-गौरव प्रताप सिंह-

आगरा। जिस विश्वविद्यालय से एक समय कोलकाता तक के कॉलेज संबद्घ हुआ करते थे, जिस विश्वविद्यालय से पढ़े हुए छात्र राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायाधीश, आईएएस और आईपीएस, सुरक्षा सलाहकार बने, उस विश्वविद्यालय की वर्तमान दौर में स्थिति बहुत बदतर है। यहां शैक्षिक माहौल दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। कई जिम्मेदारों पर जांच और उनके द्वारा फर्जीवाड़ा किए जाना साबित होने के बाद शायद यह कहना गलत नहीं होगा यह विश्वविद्यालय अब फर्जीबाड़े और घोटाले का विश्वविद्यालय बन गया है?  सीबीआई, सीबीसीआईडी, एसटीएफ, विजिलेंस, ईडी ऐसी कोई जांच एजेंसी नहीं बची है जो विश्वविद्यालय में ना आई हो। यहां वित्तीय अनियमिताएं लगातार जारी हैं। 

बात कर रहे हैं डॉ. भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय की। वर्ष 1927 में इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। जिस विश्वविद्यालय का नाम लोग बड़े गर्व से लिया करते थे, आज वह गर्त में जा रहा है। आम्बेडकर विश्वविद्यालय आज अपनी खोई हुई साख पाने को तरस रहा है। घोटाले और फर्जीवाड़ों ने यहां की छवि देश में ही नहीं विदेश में भी खराब कर दी है। इसलिए पुरानी साख पाना भी बड़ी चुनौती है। नेक से उसे ए प्लस ग्रेड भी मिला है। फिर भी लोग उसका सम्मान से नाम नहीं ले रहे हैं। आखिर इसके पीछे क्या कारण है। यह एक चिंता का विषय है।

2010 के बाद आए सभी कुलपति भ्रष्टाचार में फंसे

वर्ष 2010 के बाद से आए सभी कुलपति भ्रष्टाचार में फंस चुके हैं। वर्ष 2010 में आए कुलपति प्रो. डीएन जौहर और वर्ष 2013 में आए कुलपति प्रो. मोहम्मद मुजम्मिल के खिलाफ विजिलेंस ने हरीपर्वत थाने में वर्ष 2018 में भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज कराया था, जिसमें कई प्रोफेसर भी शामिल हैं। विजिलेंस ने कई पत्र लिखकर  अभियोजन स्वीकृति भी मांगी है। प्रो. मोहम्मद मुजम्मिल के बाद 2016 में कुलपति बनकर आए डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित की भी विजिलेंस जांच चल रही है। विजिलेंस में शिकायत की गई की इन्होंने अपने कार्यकाल में 150 करोड रुपए के निर्माण कार्य कराए, जिनकी विश्वविद्यालय में कोई आवश्यकता नहीं थी। जिस जगह का विश्वविद्यालय भूस्वामी नहीं है, उस जगह उन्होंने 45 करोड रुपए की संस्कृति भवन नाम की बिल्डिंग खड़ी करा दी। आगरा विकास प्राधिकरण के द्वारा इसका नक्शा भी पास नहीं किया जा रहा है। इसके साथ ही कुलपति डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित ने कई लोगों को संविदा पर भी नौकरी दे दी। जबकि संविदा पर नौकरी शासन से बंद हैं। उनके कार्यकाल में परीक्षा केंद्र बनाने में भी जमकर धांधली हुई। कुलपति अरविंद कुमार दीक्षित को विजिलेंस ने गोपनीय जांच में दोषी माना है। वर्तमान में उनकी खुली जांच चल रही है। कुलपति डॉ. अरविंद दीक्षित के बारे में बता दें वह एसोसिएट प्रोफेसर थे। फिर भी उन्हें कुलपति बना दिया गया था।  डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित के बाद वर्ष 2020 में कुलपति बनकर आए प्रोफेसर अशोक मित्तल की विधिक सलाहकार डॉ. अरुण कुमार दीक्षित ने भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत की थी। शिकायत पर राज भवन ने एक कमेटी भेजी। कमेटी की अध्यक्ष पूर्व न्यायमूर्ति रंजना पंड्या थीं। उन्होंने कुलपति पर भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमिताओं के लगे सभी आरोप सही पाए। इसके बाद प्रो. अशोक मित्तल को हटा दिया गया। अशोक मित्तल की विजिलेंस जांच भी चल रही है। प्रो. अशोक मित्तल के बाद 2022 में कार्यवाहक कुलपति के रूप में आए प्रो. विनय कुमार पाठक के खिलाफ एसटीएफ ने भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता के मामले में जांच की। लखनऊ के थाने में उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। एसटीएफ के बाद सीबीआई और ईडी को जांच ट्रांसफर हो गई। विनय कुमार पाठक के जाने के बाद एक अक्टूबर 2022 को प्रो. आशु रानी ने कुलपति के पद पर कार्यभार ग्रहण किया। दो साल आठ महीने के कार्यकाल में चार बड़ी शिकायत उनके खिलाफ हुई हैं। एक कर्मचारी रवि सक्सेना ने स्थाई करने के लिए रिश्वत मांगे जाने की लोकायुक्त में शिकायत की। रवि सक्सेना का कहना है कि उसके साथ के सभी कर्मचारी स्थाई कर दिए गए, उसे रिश्वत नहीं दिए जाने पर स्थाई नहीं किया जा रहा। जिस पर लोकायुक्त के यहां सुनवाई चल रही है। हालांकि कुलपति ने लोकायुक्त में अपने जवाब में आरोपों को निराधार बताया।  वहीं दूसरी ओर पूर्व कर्मचारी वीरेश कुमार ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां कुलपति सहित 11 लोगों की रिश्वत मांगने की शिकायत कोर्ट में की है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सभी के खिलाफ परिवाद दाखिल कर लिया है। पूर्व कर्मचारी का कहना है कि कमेटी ने भी उसे रखे जाने का सुझाव दिया है लेकिन रिश्वत नहीं दिए जाने पर उसे नहीं रखा जा रहा। कमेटी की जांच रिपोर्ट और सहायक कुलसचिव का पत्र भी उन्होंने याचिका के साथ कोर्ट में लगाया है। तीसरी शिकायत हाई कोर्ट अधिवक्ता कृष्ण गोपाल उपाध्याय ने की है। इन्होंने मथुरा के एक कॉलेज की शिकायत की थी लेकिन अधिकारियों ने शिकायत को नजरअंदाज कर कोर्सों की मान्यता दे दी। शासन में शिकायत के साथ न्यायालय में भी याचिका दाखिल की गई है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के  यहां परिवाद के रूप में मामले को दाखिल कर लिया गया है जिसमें सुनवाई जारी है। अब विश्वविद्यालय के विधिक सलाहकार डॉ. अरुण कुमार दीक्षित ने उनकी प्रधानमंत्री, राजभवन सहित मुख्यमंत्री से शिकायत की है। आरोप लगाया गया है कि उनके बिलों के लिए कमीशन मांगा गया है। जबकि राजभवन द्वारा बनाई गयी कमेटी के द्वारा उनके बिलों के लिए कहा गया था। प्रो. अशोक मित्तल को बिलों पर कमीशन मांगने के चलते ही हटाया था। 

प्रशासन की रिपोर्ट कार्य परिषद में ले जाकर की निरस्त

विश्वविद्यालय के द्वारा बनाये गए केंद्रों की शासन के आदेश पर हुई जांच में अपर जिलाधिकारी ने केंद्र बनाने में परीक्षा नियंत्रक और कुछ शिक्षकों को दोषी माना था। विश्वविद्यालय में केंद्र बनाने वाली कमेटी के द्वारा उन 69 कॉलेज को भी केंद्र बना दिया गया जहां सीसीटीवी कैमरे नहीं थे। एक कॉलेज के पास में कई कॉलेज स्थित थे। फिर भी 30 से 40 किलोमीटर की दूरी पर केंद्र बनाया गया। जिलाधिकारी के नेतृत्व में अपर जिलाधिकारी के द्वारा कमेटी को दोषी पाए जाने की रिपोर्ट को  कार्य परिषद में ले जाकर क्लीन चिट दे दी गई। आखिर प्रशासन की रिपोर्ट पर विवि कैसे क्लीन चिट दे सकता है? भविष्य में इस बात को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

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