आगरा नगर निगम में सत्तारूढ़ भाजपा के कई पार्षद अधिकारियों की कथित मनमानी और अपने क्षेत्रों के विकास कार्यों को लेकर असंतोष के बावजूद खुलकर आवाज नहीं उठा पा रहे हैं। पार्षदों का कहना है कि उनकी मेयर से मुलाकात और संवाद आसान नहीं है, जबकि पार्टी स्तर पर भी संवाद का मंच सीमित हो गया है। नगर निगम सदन और कार्यकारिणी की बैठकें भी नियमों के मुताबिक नहीं हो रहीं। निर्वाचित सदन कमजोर होने से नौकरशाही पर जवाबदेही का दबाव भी कम हो रहा है, ऐसा अधिकांश पार्षद मानते हैं।
नाम न छापने की शर्त पर कुछ पार्षदों ने अपनी स्थिति को ‘चक्की के दो पाटों के बीच पिसने’ जैसी बताया। एक तरफ क्षेत्रीय जनता की अपेक्षाएं हैं। काम न होने पर जनता के सवाल और ताने सुनने पड़ते हैं। दूसरी तरफ नगर निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर शिकायत करनी हो तो अपनी ही मेयर तक पहुंचना मुश्किल बताया जा रहा है। पार्षदों का कहना है कि ऐसे माहौल में वे घुटने को विवश हैं क्योंकि अपनी पीड़ा को राजनीतिक स्तर पर भी नहीं उठा पा रहे हैं। कुछ पार्षदों ने नगर निगम क्षेत्रों में होने वाले निर्माण कार्यों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि जिन पार्षदों को प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखने में महारत हासिल है, उनके क्षेत्रों में निर्धारित कोटे से अधिक तक काम हो जाते हैं, जबकि जो पार्षद जोड़तोड़ में पीछे हैं, उनकी फाइलें महीनों ही नहीं, वर्षों तक लंबित पड़ी रहती हैं। और तो और, भाजपा के तमाम पार्षदों के मुकाबले बसपा पार्षदों के क्षेत्रों में कई गुना अधिक धनराशि के निर्माण कार्य हो चुके हैं। पार्षदों की शिकायत है कि क्षेत्र में विकास कार्य नहीं होने का जवाब उन्हें जनता को देना पड़ता है, जबकि संबंधित अधिकारियों से काम कराने के लिए उनके पास पर्याप्त प्रभावी माध्यम नहीं बचता।भाजपा पार्षदों की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि नगर निगम में चल रही कथित अव्यवस्था के खिलाफ खुलकर आवाज उठाएं तो इसे अपनी ही सरकार के खिलाफ विरोध माना जा सकता है। वहीं चुप रहें तो अपने क्षेत्र की जनता के सवालों का सामना करना पड़ता है। पार्षदों के बीच एक और आशंका बनी हुई है कि यदि उन्होंने नगर निगम की कार्यप्रणाली के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाई तो इसका राजनीतिक नुकसान अगले चुनाव में टिकट कटने के रूप में उठाना पड़ सकता है। यही डर उन्हें खुलकर विरोध करने से रोक रहा है। एक भाजपा पार्षद ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह एक काम के सिलसिले में एक वरिष्ठ अधिकारी के पास गए थे। पार्षद के मुताबिक, उनकी फाइल तक फेंक दी गई। इस व्यवहार की शिकायत लेकर वे किसी तरह मेयर तक पहुंचे और अपनी पीड़ा बताई। पार्षद के अनुसार, वहां उन्हें यह टिप्पणी सुनने को मिली—‘ये अधिकारी पिछले वाले से तो अच्छे हैं न।’ पार्षद के लिए यह जवाब समस्या के समाधान के बजाय उसकी तुलना भर था। उनका सवाल था कि यदि निर्वाचित प्रतिनिधि के साथ ही ऐसा व्यवहार हो और शिकायत के बाद भी समाधान न मिले तो वह अपने क्षेत्र की जनता के सामने क्या जवाब दे।










