आगरा। 40 कांस्टेबल को कारखासी की बहुत बड़ी सजा मिली। सिर्फ एक पुलिसकर्मी को तैनाती मिली। शेष आज भी कारखास होने का खामियाजा भुगत रहे हैं। कारखासों के हटने से न तो भ्रष्टाचार रुका न थानों की कार्यप्रणाली में बदलाव आया। इस दौरान दूसरे अन्य पुलिसकर्मी जो निलंबित हुए लाइन हाजिर हुए वह तक थानों पर पहुंच गए। कई तो थाना प्रभारी बन गए। शपथ पत्र लाने पर थाना प्रभारी को बचता देखकर यह पुलिसकर्मी भी शपथ पत्र लाने के लिए तैयार हैं कि उन्होंने भी कोई गलत काम नहीं किया।
बता दें कि करीब डेढ़ साल पहले तत्कालीन एसएसपी प्रभाकर चौधरी ने चुन-चुनकर थाना प्रभारियों के कारखासों को लाइन हाजिर किया था। पुलिस लाइन में एक टीम बनाई गई थी। स्पेशल 41 नाम दिया गया। एसएसपी ने 41 पुलिस कर्मियों के लिए पुलिस लाइन में विशेष ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार कराया गया था। सभी उस कसौटी पर खरे उतरे। किसी के खिलाफ कोई विभागीय जांच लंबित नहीं है। किसी को कोई दंड नहीं मिला। आगरा कमिश्नरेट बन गया। 41 में से सिर्फ एक मुख्य आरक्षी अजय जयसवाल की सिफारिश तगड़ी थी। उसे न्यू आगरा थाने में ही तैनाती मिल गई। शेष पुलिस कर्मियों को डेढ़ साल से किसी थाने में तैनाती नहीं मिली है। कुछ पुलिस लाइन में हैं। कुछ की ट्रैफिक लाइन में ड्यूटी है। पुलिस अनुशासित बल है। इसलिए ये पुलिस कर्मी खामोश हैं। पिछले डेढ़ साल में कई इंस्पेक्टर और दरोगा लाइन हाजिर हुए। कुछ निलंबित भी हुए। वह सभी शपथपत्र ले आए। जांच में उन्हें क्लीनचिट मिल गई। दोबारा थानों पर पहुंच गए। कुछ तो थाना प्रभारी बन गए। वर्तमान में 40 अभी भी परेशान हैं। रह-रहकर उन्हें यही बात परेशान करती है कि कारखासी की बहुत बड़ी सजा मिल गई। क्या यह संभव है कि बिना थाना प्रभारी की मर्जी के कोई कारखासी कर ले। उन थाना प्रभारियों के खिलाफ आज तक कार्रवाई नहीं हुई है। कमिश्नरेट में वसूली की शिकायतें बदस्तूर जारी हैं। जिनके खिलाफ मुकदमे लिखे गए थे उन्हें तक तैनाती मिल गई। स्पेशल 40 के लिए समय-समय पर नए आदेश जारी होते हैं। कभी जज कंपाउंड की सुरक्षा में लगाया जाता है तो कभी रामबारात और जनकपुरी में विशेष ड्यूटी दी जाती है।











