नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किया। सर्वोच्च अदालत ने सख्त टिप्पणी की। कोर्ट एक फाइनेंशियल फ्रॉड मामले की सुनवाई कर रहा था। इस कथित धोखाधड़ी मामले में अदालत ने आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी थी। इस मामले की जांच कर रही एजेंसी ने एक याचिका दायर कर अदालत से अनुरोध किया कि आरोपी की अग्रिम जमानत रद्द कर दी जाए। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें (जांच एजेंसियों को) सोचना बंद कर देना चाहिए कि जांच के दौरान सभी आरोपियों को जेल भेजा जाए।
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठ जमानत मामले की सुनवाई कर रही थी। इस पीठ ने पहले भी जांच में आरोपी के सहयोग के बावजूद एजेंसियों के नियमित तरीके से गिरफ्तारी करने पर चिंता व्यक्त की थी। उस वक्त भी अदालत ने टिप्पणी की थी कि इस सोच को बदलने की जरूरत है कि सभी को सलाखों के पीछे डाल दिया जाए। पीठ ने सुनवाई की शुरुआत में पूछा कि क्या आप सभी आरोपियों को सलाखों के पीछे चाहते हैं? यह सोचना बंद करो कि हर कोई सलाखों के पीछे होना चाहिए। किसी को जमानत दे दी गई है और जमानत देते समय कड़ी शर्तें लगाई गई हैं। आप उन पर तलवारें क्यों लटकाए रखना चाहते हैं? आक्षेपित निर्णय (इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारित) कैसे गलत है? पीठ के मूड को भांपते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने कहा कि वो अदालत द्वारा उठाई गई चिंता पर एसएफआईओ से निर्देश मांगेंगे। संजय जैन ने कोर्ट से एक सप्ताह का समय मांगा। हालांकि पीठ ने समय देने से इनकार कर दिया और आरोपी विश्वनाथ गुप्ता को औपचारिक नोटिस जारी किए बिना एसएफआईओ की याचिका खारिज कर दी।
कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) ने फरवरी 2018 में एसएफआईओ को रोटोमैक ग्रुप आफ कंपनीज की 11 कंपनियों के मामलों की जांच का आदेश दिया था। मई 2020 में एमसीए ने जांच रिपोर्ट जमा करने के बाद सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए एसएफआईओ को मंजूरी जारी की। जारी की गई मंजूरी वीएनजी समूह की 21 कंपनियों के साथ-साथ विश्वनाथ गुप्ता के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए भी थी, जिन्होंने बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट ने उन्हें पिछले साल अगस्त में अग्रिम जमानत दे दी थी। शीर्ष अदालत ने कई आदेशों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संवैधानिक जनादेश के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में माना। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई आरोपी जांच में सहयोग कर रहा हो तो ये जरुरी नहीं है कि आप उसको जेल भेज दें। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मानने का कोई कारण नहीं है कि वो फरार हो जाएगा या जांच को प्रभावित करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि यह चिंता का विषय है कि ट्रायल कोर्ट जमानत को प्रोत्साहित करने के विभिन्न निर्देशों के बावजूद आरोपी को जमानत देने में अनिच्छा दिखा रहे थे और कहा कि ट्रायल कोर्ट की मानसिकता को बदलने की जरूरत है।











