नई दिल्ली। राहुल के सीबीईआई, ईडी के डर के आरोपों को लेकर मायावती ने सीधे-सीधे कुछ भी नहीं कहा लेकिन गठबंधन के आफर पर उन्होंने राहुल गांधी को अपना घर संभालने की नसीहत जरूर दे दी। मायावती ने कहा कि राहुल ने यह बयान उनकी पार्टी की छवि को खराब करने के लिए दिया है।
यूपी में इस बार हुए विधानसभा चुनाव में बसपा को 12.88 फीसदी वोट मिले। वहीं कांग्रेस को महज 2.33 प्रतिशत वोट मिले। ऐसे में दोनों दलों के वोट शेयर को मिला भी दे तो यह सिर्फ 15 फीसदी ही होता है। कांग्रेस को इस बार महज दो सीटों पर ही जीत हासिल हुई। पार्टी की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में उसके 97 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। ऐसे में बसपा को कांग्रेस से हाथ मिलाने का फायदा मिलना तो मुश्किल ही था। खास बात है कि कांग्रेस भले ही राष्ट्रीय पार्टी हो लेकिन यूपी में वोट प्रतिशत के मामले में उसकी हैसियत छोटे राष्ट्रीय लोक दल से भी छोटी है। रालोद को यूपी में इस बार 2.85 प्रतिशत वोट मिले जो कांग्रेस से अधिक हैं। 1989 के विधानसभा चुनाव से कांग्रेस की स्थिति खराब होनी शुरू हुई थी। उसी समय से बसपा का यूपी की राजनीति में धीरे-धीरे प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ।
यूपी में इस बार साफ था कि बीजेपी का सीधा मुकाबला समाजवादी पार्टी से था। इस बात से तो मायावती भी इनकार नहीं कर सकती थीं। मायावती ने इस बार कांग्रेस का आफर शायद इसलिए भी ठुकरा दिया होगा कि उन्हें कही न कहीं अपना कोर दलित वोटर खिसकने की आशंका हो। इतिहास पर नजर डालें तो कांग्रेस की राजनीति मुख्य रूप से दलित, मुस्लिम और ब्राह्मणों के इर्दगिर्द घूमती रही है। ये तीनों ही कांग्रेस का वोट बैंक रहे हैं। कांशी राम, रामविलास पासवान जैसे नेताओं और क्षेत्रीय दलों के उभरने के बाद से कांग्रेस का दलित वोट बैंक खिसकना शुरू हो गया। कांग्रेस के दलित वोट बैंक में सेंध लगा कर ही यूपी में बसपा और समाजवादी पार्टी कांग्रेस के लिए चुनौती बने। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बीएसपी कांग्रेस से हाथ मिला भी लेती तो उसको कोई फायदा तो नहीं मिलता बल्कि उनका अपना वोट बैंक कांग्रेस के साथ जरूर शिफ्ट हो जाता। वैसे भी कांशी राम से पहले बाबू जगजीवन राम जैसे राष्ट्रीय चेहरे के बूते कांग्रेस को दलितों का समर्थन मिलता था। ऐसे में मायावती को अपने कोर वोटर के खिसकने का भी अंदेशा जरूर रहा होगा।











