-गौरव प्रताप सिंह-
आगरा। डॉ. भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय की मेडिकल परीक्षा में उत्तर पुस्तिका बदलने के मामले में (ईडी) प्रवर्तन निदेशालय को जांच करता देख खलबली मची हुई है। कईयों को फंसने का डर सता रहा है। ईडी कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है। आने वाले दिनों में कई और लोगों से पूछताछ होने की संभावनाएं हैं।
बता दें कि पिछले साल बीएएमएस और एमबीबीएस की उत्तर पुस्तिकाएं बदलने के मामले में मुकदमा दर्ज कराया गया था। मामले में पुलिस ने छात्र नेता राहुल पाराशर, टेंपो चालक देवेंद्र और एक चिकित्सक को गिरफ्तार किया था। इस मामले में ईडी ने जांच शुरू की थी। ईडी ने परीक्षा परिणाम का काम देख रही एजेंसी डिजिटेक के मालिक डेविड मारियो, छात्र नेता राहुल पाराशर और टेंपो चालक देवेंद्र को भी गिरफ्तार किया था। तीनों की रिमांड भी ली थी। ईडी के द्वारा इस मामले में कई लोगों से पूछताछ की जा रही है। अधिकारियों से भी वह कई मामलों में जानकारी कर रही है। ईडी को गंभीरता से जांच करता देख मेडिकल के खेल में संलिप्त माफिया के बीच में खलबली मची हुई है। सूत्रों का कहना है कि गोपनीय विभाग के एक बाबू को पिछले दिनों पूछताछ के लिए भी बुलाया गया था। वह शक के घेरे में हैं। इसके अलावा प्रकाशन विभाग के एक बाबू के द्वारा उत्तर पुस्तिकाएं भेजी जाती हैं। सूत्रों का कहना है कि उससे भी बुलाया गया है।
विश्वविद्यालय के अधिकारी भी मेडिकल की खेल में मिले हुए?
आगरा। विश्वविद्यालय के अधिकारी भी मेडिकल के खेल में मिले हुए रहते हैं। इस बात का उदाहरण यह है कि विश्वविद्यालय के द्वारा एक बार प्राइवेट कॉलेज में मेडिकल के छात्रों की कॉपियां चेक करने के लिए भेज दी गई थीं। जिस कॉलेज में कॉपियां भेजी गई थी उस कॉलेज की छात्रा ने टॉप भी किया था। इस बात को लेकर सवाल भी खड़े हुए थे। प्राइवेट कॉलेज में कॉपियां चेक कराने का प्रावधान नहीं है फिर भी अधिकारियों ने वहां चेक करने के लिए भेज दी थी। अगर पूरे खेल की जांच हुई तो कई अधिकारी लपेटे में आ सकते हैं।
फर्जीवाड़े में जेल गए व्यक्ति को नौकरी देकर कराया जा रहा था गोपनीय काम
आगरा। विश्वविद्यालय में कई स्थाई चालक मौजूद हैं। इसके बावजूद विश्वविद्यालय के अधिकारियों के द्वारा डेली बेसिस के कर्मचारी देवेंद्र से कॉपियों को सेंटर से एजेंसी के पास लाने ले जाने का काम कराया जा रहा था। यह स्थिति जब थी जब वह कई छात्रों को फर्जी मार्कशीट देने के मामले में मथुरा से जेल जा चुका है। जेल जाने के बाद भी उसे विश्वविद्यालय में कैसे नियुक्ति दे दी गई और गोपनीय काम कैसे दे दिया गया? यह सवाल खड़े हो रहे हैं। एक अधिकारी का वह खास बताया जाता था। वह इस समय विश्वविद्यालय में तैनात हैं। इधर विश्वविद्यालय के अधिकारी उसे नियुक्ति देने के मामले में फंस सकते हैं। जेल गए व्यक्ति को नौकरी देने और गोपनीय काम कराने में अधिकारियों के ऊपर गाज गिर सकती है।











