नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को समाजवादी पार्टी के विधायक आजम खान की जमानत से जुड़ी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शर्त पर रोक लगा दी। खान ने अपनी याचिका में दावा किया था कि यह शर्त उनके जौहर विश्वविद्यालय के एक हिस्से को ढहाने से संबंधित है, जिसे कथित तौर पर शत्रु संपत्ति पर कब्जा करके बनाया गया था। न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई जमानत संबंधी शर्त प्रथम दृष्टया असंगत है और दीवानी अदालत की डिक्री की तरह लगती है।
पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 10 मई के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि यह कहा गया था कि याचिकाकर्ता (खान) को उम्र और उनके स्वास्थ्य के आधार पर जमानत दी जा रही है जबकि उनके खिलाफ शुरू किए गए ज्यादातर मामलों में उन्हें जमानत मिल गई है। पीठ ने आगे कहा कि हालांकि, जमानत दिए जाने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई शर्तें प्रथम दृष्टया असंगत हैं और उन शर्तों के साथ कोई तार्किक संबंध नहीं है जो आरोपी की उपस्थिति को सुरक्षित करने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि सुनवाई की निष्पक्षता बाधित नहीं हो।
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश में, एकल न्यायाधीश ने टिप्पणी की है कि जमानत याचिका पर मौजूदा आदेश एक दीवानी अदालत की डिक्री की तरह लग सकता है जो संपत्ति पर मालिकाना हक से संबंधित है। उसने कहा कि फिर भी, प्रथम दृष्टया उच्च न्यायालय ने जमानत देने की शर्तों को लागू करते हुए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 के तहत अधिकार क्षेत्र से जुड़े मापदंडों को पार कर लिया है। इसके साथ ही पीठ ने रामपुर के जिलाधिकारी को भूमि की माप करने, विश्वविद्यालय से जुड़ी भूमि पर कब्जा करने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा जारी निदेर्शों पर रोक लगा दी और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा। पीठ ने कहा कि वह सुनवाई की अगली तारीख में उन शर्तों पर गौर करेगी।











