आगरा। आईईटी में आज दिनभर ड्रामा चला। पूर्व निदेशक का कहना था कि उन्हें सूचना मिली थी कि उन्हें मारने के लिए कुछ लड़के बुलाए गए हैं। हमला होने की आशंका से वे संस्थान में नहीं आए, उन्होंने कुलपति को भी इस बात की सूचना दी। इधर सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर उन पर हमला करने की साजिश किसने रची थी? यह सिर्फ अफवाह थी या सच्चाई?
बात दें कि शुक्रवार को आइक्यूएसी की बैठक में प्रोफेसर वीके सारस्वत ने कुलपति से कहा था कि उन्हें जानबूझकर किनारे किया जा रहा है। कुलपति के द्वारा बताए गए बिलों का उन्होंने सत्यापन नहीं किया, इसलिए उन्हें आईईटी के निदेशक पद से हटाया जा रहा है। बैठक में प्रोफेसर वीके सारस्वत और प्रोफेसर संजीव कुमार के बीच में भी गर्मा गर्मी हुई थी। इधर आज सुबह प्रोफेसर वीके सारस्वत ने कुलपति को फोन कर कहा कि उन्हें मारने के लिए खंदारी परिसर में लड़के बुलाए गए हैं। क्या उन्हें मरवाकर ही दम लिया जाएगा। कुलपति ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है और इसके बाद उन्होंने फोन काट दिया। इसके बाद डरते हुए वह अपने संस्थान में पहुंचे।
इधर विश्वविद्यालय के चीफ प्रॉक्टर प्रोफेसर मनोज श्रीवास्तव 20-25 सुरक्षाकर्मियों को लेकर आईईटी में मौजूद थे। चीफ प्रॉक्टर का कहना था कि उन्हें रात में सूचना मिली थी कि शनिवार सुबह आईईटी में हंगामा हो सकता है। कुलसचिव ने उन्हें रात में ही अलर्ट कर दिया था। प्रोफेसर मनोज श्रीवास्तव निदेशक के ऑफिस में बैठे हुए थे। यहां दोनों के बीच उस समय गरमा-गरमी भी हो गई। जब प्रोफेसर वीके सारस्वत ने उन्हें बाहर जाने के लिए कहा।
इधर देर शाम प्रोफेसर वीके सारस्वत कुलसचिव डॉ. विनोद कुमार सिंह के पास पहुंचे और प्रोफेसर मनु प्रताप सिंह को निदेशक का चार्ज देने के लिए बुलाने के लिए कहा। कुलसचिव ने प्रोफेसर मनु प्रताप सिंह को बुलाया, जिसके बाद दोनों के बीच में चार्ज का आदान प्रदान हो गया।
कौन से दो बिल थे जो प्रोफेसर सारस्वत ने सत्यापित नहीं किए, जानें
वर्ष 2014 में सुभ्राटेक एजेंसी छात्रों का डाटा लेकर विश्वविद्यालय से भाग गई थी। एजेंसी के खिलाफ एफ आईआर दर्ज कराई गई थी। प्रो. सारस्वत का आरोप है कि वर्तमान कुलपति उन पर एजेंसी के दो करोड रुपए के बिल को सत्यापित करने के लिए दबाव बना रहे थे। प्रोफेसर सारस्वत का कहना है कि उन्होंने बिल सत्यापन के लिए मना कर दिया था क्योंकि उन्हें किसी जांच के घेरे में नहीं आना था। इसके अलावा डिजी लॉकर के लिए विश्वविद्यालय ने 22 लाख का भुगतान किया है। यह भुगतान नियम विरुद्ध किया गया है। इस फाइल पर भी उनके हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया गया था। प्रोफेसर वीके सारस्वत ने साफ साफ मना कर दिया था। इसके बाद से ही कुलपति उनसे नाराज चल रहे थे।











