आगरा। डॉ. भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय के विधिक सलाहकार को कूटरचित दस्तावेज बनाकर, गलत आरोप लगाते हुए व उनकी भुगतान की फाइलों को गायब कर कार्यविरत किए जाने के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुनवाई चल रही है। 22 जुलाई को कुलपति सहित कार्य परिषद के सभी सदस्यों और अन्य विपक्षियों को कोर्ट में हाजिर होकर जवाब देना था। लेकिन विश्वविद्यालय की ओर से किसी के द्वारा जवाब दाखिल नहीं किया गया। जवाब दाखिल नहीं किए जाने की बात को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने घोर आपत्तिजनक मानते हुए अपर मुख्य सचिव राज्यपाल को आदेशित करते हुए जवाब मांगा है। अब मामले में 22 अगस्त को सुनवाई होगी।
बीते दिनों विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा विधिक सलाहकार डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित को कार्य विरत किया गया था। अधिवक्ता डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां एक याचिका दाखिल की है। इसमें उन्होंने कहा है कि जिस पत्र के माध्यम से मुझे कार्यविरत गया है उसमें जो भी उन पर आरोप लगाए गए हैं। वह सभी झूठे व कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर बनाये गए हैं। कुलसचिव के आदेश में उन्होंने उनके भुगतान संबंधी फाइल विभाग में उपलब्ध नहीं होने की बात कही है। इस पर डॉक्टर दीक्षित ने अपनी याचिका में कहा है कि उनकी फाइलों को अधिकारियों के द्वारा जानबूझकर गायब किया गया है। कुलसचिव ने अपने पत्र में जिक्र किया था कि वह केसों में सही तरीके से पैरवी भी नहीं करते हैं। इस पर उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि अभी तक उन्होंने शत प्रतिशत विश्वविद्यालय को केस जिताए हैं और करोड़ों रुपए का फायदा कराया है। इसका विधि विभाग में रिकार्ड मौजूद है। कुलपति प्रोफेसर आशु रानी, उप कुल सचिव पवन कुमार, प्रोफेसर राजीव वर्मा और बाबू राधिका प्रसाद पर 30% कमीशन मांगे जाने का उन्होंने आरोप लगाया है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि पूर्व में भी कमीशन के लालच में तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर अशोक मित्तल के कार्यकाल में उनके भुगतान रोके गए थे जिसकी उन्होंने कुलाधिपति से शिकायत की थी। शिकायत पर कुलाधिपति ने सेवानिवृत न्यायमूर्ति रंजना पंड्या की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी ने भी अधिवक्ताओं के बिलों को रोकना गलत पाया था। कुलाधिपति ने अपने आदेश में भी इस बात का जिक्र किया है। कुलाधिपति के इस आदेश को उन्होंने अपनी याचिका में संलग्न किया है। डॉक्टर दीक्षित ने अपनी याचिका में कहा है कि कुलसचिव द्वारा जारी पत्र में उन्हें कूट रचित दस्तावेज बनाकर 8 दिसंबर 2021 से रिटेर्शिप पर दिखाया है, जिससे उनका भुगतान न हो सके। जबकि वास्तव में वह 28 मई 2022 से रिटेनर्शिप पर है। इसके सभी कागज उन्होंने याचिका में दाखिल किए हैं। उन्होंने अपनी याचिका यह भी कहा है कि कुलपति के द्वारा 8 जून 2025 को प्रेस वार्ता कर कहा गया था कि अधिवक्ता द्वारा लगाए गए रिश्वत मांगने के आरोपों की जांच सेवानिवृत न्यायाधीश विष्णु गुप्ता की अध्यक्षता में गठित की गई उच्च स्तरीय समिति करेगी। इसके बाद 13 जून 2025 को कुलपति ने मीडिया में कहा कि हाई कोर्ट के सेवानिवृत जज की अध्यक्षता में जांच की गई। जांच रिपोर्ट में पाया गया की अधिवक्ता द्वारा की गई शिकायत पूरी तरह भ्रामक है। इस पर डॉक्टर दीक्षित ने याचिका में हैरानी जाहिर करते हुए कहा है कि तीन से चार दिन के अंदर जांच कमेटी भी बन गई और उसकी रिपोर्ट भी आ गई और अधिवक्ता को कमेटी ने बुलाया भी नहीं। उन्होंने कहा है कि इन लोगों ने षड्यंत्र करते हुए फर्जी कमेटी बनाकर उन पर आरोप लगा दिए हैं। जबकि उन्होंने 7 जून व 13 जून 2025 को आरटीआई के माध्यम से जांच कमेटी के संबंध में जानकारी मांगी है जो आज तक उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस संबंध में उन्होंने 10 जून और 25 जून को कुलसचिव को भी पत्र लिखा है, जिसका उन्होंने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है।
अधिवक्ता डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित की ओर से अपनी याचिका में कुलपति प्रोफेसर आशु रानी, तत्कालीन कुल सचिव डॉक्टर ओमप्रकाश, कुल सचिव अजय मिश्रा प्रोफेसर राजीव वर्मा, उप कुलसचिव पवन कुमार, आईईटी के निदेशक प्रोफेसर मनु प्रताप सिंह, प्रोफेसर संजय चौधरी, विश्वविद्यालय द्वारा बनी जांच कमेटी के सभी सदस्य, बाबू राधिका प्रसाद उप कुलसचिव अनूप केशरवानी, 6 जून को हुई कार्य परिषद के सभी सदस्यों को आरोपी बनाया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सुनवाई के बाद परिवाद दर्ज 22 जुलाई को सभी विपक्षियों को न्यायालय में उपस्थित होकर अपना- अपना जवाब दाखिल करने के आदेश दिए थे। 22 जुलाई को विश्वविद्यालय की ओर से किसी ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया। इसके बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपर मुख्य सचिव राज्यपाल को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल नहीं करने की बात को घोर आपत्तिजनक बताया है। उन्हें आदेशित किया है 22 अगस्त को इस मामले में वह अपना जवाब कोर्ट में दाखिल करें।











