आगरा। कमला नगर थाने में सट्टे के मास्टरमाइंड का मुकदमे में नाम दर्ज नहीं होने से मामला सुर्खियों में छाया हुआ है। इलाके के लोग भी थाना पुलिस पर सवाल खड़े कर रहे हैं। मामले में अधिकारियों के द्वारा एएसपी हरीपर्वत को जांच सौंपी गई है। जांच अधिकारी इस बात की जांच करेंगे की मौके से जब दो लोग पकड़े गए थे तो उनसे पूछकर फरार दोनों लोगों के पूरे नाम उनके पिता के नाम और उनके निवास स्थान क्यों नहीं लिखे गए। सिर्फ अनूप नाम ही क्यों लिखा गया? क्या लाभ देने की पुलिस की मंशा थी? मामले में थानाध्यक्ष और विवेचक के ऊपर कारवाई की तलवार लटक सकती है। दोनों की ही कार्यशैली विभाग में सुर्खियों में छाई हुई है।
पांच दिसंबर 2025 को पुलिस ने लोहिया नगर में एक घर में दबिश दी थी। शिवम और भारत कुमार को मौके से गिरफ्तार दिखाया गया। चौकी प्रभारी बल्केश्वर अमित कुमार ने अपनी तरफ से मुकदमा दर्ज कराया। मुकदमे में प्रवीन उर्फ हप्पू और अनूप कमला नगर को वांछित दिखाया। इलाके में दिल्ली का सट्टा अनूप अग्रवाल कराता है। वही मास्टर माइंड बताया जाता है। पुलिस को अच्छे से पता भी था। फिर भी एफआईआर में अनूप अग्रवाल का नाम पूरा नहीं खोला गया। जबकि मौके से दो लोग पकड़े गए थे। वह पुलिस के ही साथ थे और करीब 12 से 15 घंटे पुलिस के साथ रहे। फिर भी पुलिस उनसे फरार दोनों लोगों के पूरे नाम और पते नहीं जान पाई। सवाल खड़े हो रहे हैं कि जब पुलिस को कोई खेल करना था यह तभी तो संभव है। चर्चाएं आम है कि पुलिस मास्टरमाइंड को लाभ देना चाहती थी और मास्टरमाइंड अनूप अपने नाम राशि चेले अनूप की जमानत कराने के बाद मुकदमे से बचने की फिराक में था। क्षेत्र में सभी को पता है कि प्रवीन उर्फ हप्पू के साथ अनूप अग्रवाल दिल्ली के सट्टे का काम करता है। पुलिस भी जानती थी। इसके बावजूद मुकदमे में अधूरा नाम यानी कि सिर्फ अनूप लिखा गया अनूप अग्रवाल नहीं। इधर मास्टरमाइंड के चेले अनूप कश्यप ने अपनी अग्रिम जमानत करा ली। मुकदमा पांच दिसंबर को दर्ज हुआ है और 16 दिसंबर को विवेचक मुखबिर के माध्यम से अनूप कश्यप का पर्चे में नाम बढ़ा रहे हैं। जब दो लोग मौके से पकड़े गए थे उनसे पुलिस नाम जान सकती थी तो मुखबिर नाम का सहारा नाम बढ़ाने में क्यों लिया गया? वह भी मुकदमा दर्ज होने के 11 दिन बाद। यहां से विवेचक और बुरे फंस गए हैं। इसके बाद सवाल यह है कि पुलिस ने फरार दोनों लोगों को पकड़ने के प्रयास क्यों नहीं किए? उन्हें जमानत तक का समय क्यों दिया गया? थानाध्यक्ष योगेश कुमार के बारे में विभाग वालों का कहना है कि वह मथुरा में भी विवादों में रहे हैं। 8 साल की नौकरी में निलंबित और लाइन हाजिर की कई बार कार्रवाई उन पर हो चुकी हैं। हाईवे थाने में तैनाती के दौरान एक मामले में उनका निलंबन हुआ था। डौकी में तैनाती के दौरान विधायक छोटेलाल वर्मा ने दो बार मुख्यमंत्री से जाकर उनकी कार्यशाली की शिकायत की।











