आगरा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षी “ग्रेटर आगरा” परियोजना अब पर्यावरणीय और कानूनी विवादों में घिरती नजर आ रही है। करीब 5,142 करोड़ रुपये की इस बड़ी परियोजना का लगभग 23 हेक्टेयर हिस्सा यमुना नदी के डूब क्षेत्र (फ्लड जोन) में पाया गया है, जिसके बाद दो प्रस्तावित टाउनशिप में निर्माण गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है।
आगरा विकास प्राधिकरण द्वारा तैयार की जा रही इस मेगा योजना के कुछ हिस्से को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के सैटेलाइट सर्वे में फ्लड जोन के रूप में चिन्हित किया गया है। इसके बाद परियोजना के पर्यावरणीय पहलुओं और मंजूरी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। एडीए सूत्रों के मुताबिक, यमुना के डूब क्षेत्र में आने वाले हिस्से में अब किसी प्रकार का स्थायी या कंक्रीट निर्माण नहीं किया जाएगा। पर्यावरणीय मानकों को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र को वॉटर बॉडी और ग्रीन बेल्ट के रूप में विकसित करने की तैयारी की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लड जोन में बड़े पैमाने पर निर्माण भविष्य में जलभराव, बाढ़ और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। इसी कारण परियोजना के नक्शे और विकास मॉडल में संशोधन की प्रक्रिया शुरू की गई है। ग्रेटर आगरा परियोजना को लेकर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या पर्यावरणीय स्वीकृतियों से पहले ही परियोजना को आगे बढ़ाया गया। एनजीटी के सर्वे के बाद अब परियोजना की तकनीकी और पर्यावरणीय समीक्षा और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फ्लड जोन में निर्माण हुआ तो भविष्य में कानूनी अड़चनें बढ़ सकती हैं, साथ ही भारी बारिश के दौरान जलभराव और बाढ़ जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
20 मई की एडीए बोर्ड बैठक में होगा बड़ा फैसला
सूत्रों के अनुसार, 20 मई को होने वाली एडीए बोर्ड बैठक में ग्रेटर आगरा परियोजना के संशोधित स्वरूप, भूखंडों की दरों और फ्लड जोन से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। माना जा रहा है कि पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप परियोजना में कई अहम बदलाव किए जा सकते हैं।











