आगरा। सरकारी जमीनों पर कब्जे और नक्शा पास के मामले इन दिनों सुर्खियों में छाए हुए हैं। आगरा विकास प्राधिकरण में नजूल भूमि से जुड़े लगातार सामने आ रहे मामले इन सवालों को गंभीर बना रहे हैं। सरकारी जमीनों पर निर्माण और उनके नक्शे स्वीकृत कराने के खेल में अब धाकरान का मामला भी जुड़ गया है। गुड़ की मंडी प्रकरण में पहले से मुकदमा दर्ज होने के बाद धाकरान की नजूल भूमि पर व्यावसायिक मानचित्र स्वीकृत कराने के मामले में चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है।
इस प्रकरण में सबसे गंभीर आरोप यह है कि नजूल विभाग की एनओसी नहीं मिलने के बावजूद कथित फर्जी आख्या और दस्तावेजों के आधार पर व्यावसायिक नक्शा स्वीकृत करा लिया गया। मामला सामने आने के बाद एडीए ने विवादित मानचित्र निरस्त कर दिया है और निर्माण के संबंध में नोटिस भी जारी किया है। अब पुलिस जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि कथित फर्जी पत्र किसने तैयार किया, उसे सरकारी पोर्टल पर किसने अपलोड किया और दस्तावेजों की सत्यता की जांच किए बिना नक्शे को मंजूरी कैसे मिल गई?
धाकरान नजूल भूमि प्रकरण में एडीए के सहायक अभियंता रमन कुमार की तहरीर पर अजय महाजन, प्रमोद कुमार गुप्ता, संजीव गुप्ता और इंजीनियर बनवारी सिंह को नामजद किया गया है। चारों के खिलाफ लोहामंडी थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया है। आरोप है कि विवादित जमीन पर व्यावसायिक निर्माण के लिए मानचित्र स्वीकृत कराने में नजूल विभाग की अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) के स्थान पर कथित फर्जी आख्या का सहारा लिया गया। जबकि संबंधित जमीन के संबंध में नजूल विभाग ने एनओसी देने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद नक्शा स्वीकृत होने से एडीए की मानचित्र स्वीकृति प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। विवादित भूमि सर्वे शीट नंबर 107, मौजा चक अब्बल में दर्ज बताई गई है। जमीन के नजूल भूमि होने के कारण निर्माण संबंधी अनुमति के लिए नजूल विभाग की स्थिति और एनओसी महत्वपूर्ण थी। विभाग की ओर से एनओसी नहीं दिए जाने के बावजूद व्यावसायिक मानचित्र स्वीकृत होने का मामला सामने आया। अब जांच का अहम पहलू यह है कि जब संबंधित विभाग ने जमीन के संबंध में अनापत्ति नहीं दी थी तो मानचित्र स्वीकृति के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों को किस आधार पर स्वीकार किया गया? क्या संबंधित अधिकारियों ने नजूल विभाग से सीधे सत्यापन कराया था या पोर्टल पर अपलोड दस्तावेजों को ही सही मानकर प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई?
इस पूरे प्रकरण में चार जनवरी 2025 का कथित आपत्ति पत्र सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आया है। आरोप है कि इस पत्र को एडीए के ऑनलाइन बिल्डिंग प्लान अप्रूवल सिस्टम (ओबीपीएएस) पोर्टल पर अपलोड किया गया था। इसी दस्तावेज को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। बताया गया है कि नजूल विभाग ने इस पत्र को अपने कार्यालय से जारी होने से ही इनकार कर दिया है। ऐसे में पत्र की प्रमाणिकता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि पत्र विभाग की ओर से जारी ही नहीं किया गया तो इसे तैयार किसने किया? पोर्टल पर अपलोड करने की जिम्मेदारी किसकी थी? दस्तावेज की जांच किस स्तर पर हुई और उसी के आधार पर व्यावसायिक मानचित्र को मंजूरी कैसे मिल गई? इन सवालों के जवाब पुलिस जांच में तलाशे जाएंगे। कथित पत्र की वास्तविकता और उसके इस्तेमाल की परिस्थितियां सामने आने के बाद मामले में अन्य लोगों की भूमिका भी स्पष्ट हो सकती है।
आगरा में नजूल भूमि से जुड़ा यह पहला मामला नहीं है। गुड़ की मंडी प्रकरण में भी पहले से मुकदमा दर्ज है। अब धाकरान की जमीन पर कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर व्यावसायिक नक्शा स्वीकृत कराने का मामला सामने आने से एडीए की कार्यप्रणाली पर चर्चा तेज हो गई है। दोनों प्रकरणों में सरकारी जमीन, निर्माण और मानचित्र स्वीकृति की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या एडीए में नक्शा स्वीकृत कराने के दौरान जमीन के स्वामित्व और संबंधित विभागों की एनओसी का पर्याप्त सत्यापन किया जा रहा है? यदि एक ही तरह की अनियमितताएं अलग-अलग मामलों में सामने आ रही हैं तो मानचित्र स्वीकृति की पुरानी फाइलों की जांच भी जरूरी हो सकती है।











