आगरा। ब्रेन स्ट्रोक यानी दिमाग का दौरा। यह तब होता है जब रक्त वाहिका में ब्लॉकेज हो जाता है और मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति कम हो जाती है, या रक्त वाहिका से रिसाव होता है, जिससे ब्रेन में ब्लीडिंग हो जाती है। लगभग 85 प्रतिशत स्ट्रोक मस्तिष्क की आपूर्ति करने वाली रक्त वाहिका में ब्लॉकेज के कारण होते हैं और बाकी रक्त वाहिका से रिसाव के कारण होते हैं। अगर किसी को स्ट्रोक पड़ता है तो कुछ जरूरी लक्षणों की पहचान करना आवश्यक है। जैसे चेहरा गिरना, हाथों या पैरों में कमजोरी, बोलने में दिक्कत (यानी F-फेस, A-आर्म, S-स्पीच, T-टाइम)। इन लक्षणों की पहचान कर शुरुआती जल्दी इलाज कराएं ताकि ब्रेन को होने वाली परमानेंट क्षति से बचा जा सके और मौत के खतरे को कम किया जा सके।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल साकेत (नई दिल्ली) में इंटरवेंशनल न्यूरोलॉजी के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉक्टर हिमांशु अग्रवाल ने बताया कि स्ट्रोक लक्षणों और उनसे बचाव के बारे में आम जनता और मेडिकल फील्ड के लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। जिन मरीजों को डायबिटीज, हाइपरटेंशन, स्मोकिंग, हार्ट डिजीज, हाई कोलेस्ट्रॉल होता है उन्हें स्ट्रोक का ज्यादा रिस्क रहता है। इसके अलावा जेनेटिक परेशानियों के चलते भी किसी को स्ट्रोक से जूझना पड़ सकता है।
स्ट्रोक दुनिया भर में मौत का दूसरा प्रमुख कारण है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2019 के अनुसार, पिछले दो दशकों में दुनिया भर में स्ट्रोक से होने वाली मौतों में लगभग 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सबसे ज्यादा मामले (लगभग 85 प्रतिशत) निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सामने आए हैं। पिछले तीन दशकों में इन देशों में स्ट्रोक की दर दोगुनी हो गई है। भारत भी अन्य विकासशील देशों की तरह स्ट्रोक की चपेट में है।
पिछले तीस वर्षों में, स्ट्रोक से विकलांगता और मृत्यु दर को कम करने के लिए बहुत रिसर्च की गई हैं। नब्बे के दशक के मध्य में, इंट्रा-वीनस थ्रोम्बोलाइटिक (थक्का हटाने वाली दवा) के जरिए करीब एक तिहाई स्ट्रोक मरीजों को मदद दी गई। ऐसा तब हो पाया जब वे स्ट्रोक के लक्षण महसूस होने के 4.5 घंटे के भीतर ही डॉक्टर के पास पहुंचे। इसके अलावा स्ट्रोक का इलाज अल्ट्रासोनोग्राफिक क्लॉट बर्स्टिंग, इंट्रा-आर्टेरियल थ्रोम्बोलिसिस के जरिए भी किया जाता रहा है।
इसके बाद के दशकों में न्यूरोइंटरवेंशन/एंडोवैस्कुलर न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में काफी तरक्की हुई जिससे स्ट्रोक के इलाज में क्रांति आ गई। मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी (स्टेंट का उपयोग करके ब्रेन वेसल्स से क्लॉट हटाना) से अब स्ट्रोक के मरीजों का इलाज किया जा सकता है। यह लक्षण शुरू होने के 24 घंटे बाद भी संभव है। स्ट्रोक के इलाज में यह सबसे प्रभावी प्रक्रिया के रूप में उभरी है। इस क्षेत्र में लगातार रिसर्च चल रही हैं। बेहतर मशीनरी और स्टेंट के विकास से मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी और अन्य न्यूरो-इंटरवेंशनल प्रक्रियाओं की सेफ्टी और सफलता दर में जबरदस्त सुधार हुआ है। एक्यूट स्ट्रोक के मामलों में, न्यूरो-इंटरवेंशनल प्रक्रियाओं से ब्रेन हैमरेज जैसी जानलेवा बीमारी से बचाव किया जा सकता है। हमने पिछले पांच वर्षों में स्ट्रोक मरीजों में 500 से ज्यादा मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी और एन्यूरिज्म कोइलिंग को मिनिमली इनवेसिव तरीके से किया है और इस तरह ब्रेन की ओपन सर्जरी करने से बचा गया है।अंत में यही कहेंगे कि स्ट्रोक का इलाज किया जा सकता है। इसमें लक्षणों पर गौर करने की जरूरत है। जितनी जल्दी लक्षणों का पता चल जाए उतना ही इससे बचाव किया जा सकता है। लक्षणों का अनुभव होने पर एक्यूट स्ट्रोक का इलाज करने वाले अस्पतालों में तुरंत ट्रीटमेंट लें।











