-गौरव प्रताप सिंह-
आगरा। डॉ. भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय में वर्ष 2013 में परीक्षा संबंधी कार्य करने वाली एजेंसी माइंडलोजिक्स और वर्ष 2014 में काम करने वाली एजेंसी सुभ्राटेक पर चार्टों में हेरफेर करने, छात्रों का रिजल्ट घोषित नहीं करने, बीच में काम छोड़कर भाग जाने, छात्रों का रिजल्ट सही नहीं करने संबंधी मामले में तत्कालीन कुलसचिव की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई थी। मामले में विवेचक ने बिना साक्ष्य के ही एफआर लगा दी। मामले में तत्कालीन कुलसचिव ने एफआर निरस्त करने की मांग की थी। विश्वविद्यालय अधिवक्ता की दलीलों को सुनने के बाद अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने एफआर को निरस्त कर दिया है। पुनः विवेचना करने के निर्देश दिए हैं। अब नए सिरे से यह विवेचना फिर से होगी।
माइंडलोजिक्स पर क्या थे आरोप, जानें
तत्कालीन कुलसचिव केएन सिंह ने हरीपर्वत थाने में तहरीर देकर कहा था कि माइंडलोजिक्स एजेंसी को परीक्षा संबंधी कार्य दिया गया था। एजेंसी की तरफ से शैलेंद्र टंडन मैनेजर थे। वह आगरा के ही रहने वाले थे। शैलेंद्र टंडन ने वर्ष 2013 का रिजल्ट सही तरीके से तैयार नहीं किया था। स्थानीय लोगों से उनकी मिली भगत थी। 2013 से उनसे चार्ट मांगे गए लेकिन यह 2015 से उपलब्ध कराना शुरू कराए गए। एजेंसी द्वारा वर्ष 2013 की परीक्षा की समाप्ति के तीन वर्ष बाद चार्ट उपलब्ध कराए गए, उसमें भी करीब 30559 छात्रों का परीक्षाफल अपूर्ण था। इस वजह से छात्र-छात्राओं को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि एक छात्रा को दो सीरियल नंबर पर दो मार्कशीट जारी की गई। गोपनीय विभाग में उपलब्ध कराए गए चार्ट में अलग नंबर थे और परीक्षा विभाग में मौजूद चार्ट में अलग नंबर। कुलसचिव ने कहा था कि चार्टों में अंको की हेराफेरी उक्त एजेंसी द्वारा की गई है। इसके जिम्मेदार शैलेंद्र टंडन हैं। विलंब से परीक्षाफल घोषित करने, परीक्षाफल अपूर्ण रखने, विलंब से फाइनल डेटा और अधिकांश चार्ट उपलब्ध कराने के लिए शैलेंद्र टंडन और एजेंसी के मार्केटिंग ऑफिसर राघव नारायण दोषी हैं। तहरीर पर पुलिस ने धोखाधड़ी और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया था। मामले में विवेचक अभय प्रताप सिंह के द्वारा एफआर लगा दी गयी। कुलसचिव केएन सिंह के द्वारा विश्वविद्यालय के अधिवक्ता डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित के माध्यम से कोर्ट में एफआर को चुनौती दी गई। शुक्रवार को मामले में कोर्ट में सुनवाई हुई। अधिवक्ता ने कहा कि विवेचक ने मामले की गंभीरता से जांच नहीं की है। ना ही कुलसचिव के बयान लिए हैं। विवेचक ने आरोपियों के साथ मिलकर पूरे मामले में लीपापोती कर दी है। कोर्ट ने अधिवक्ता की दलीलों को सुनने के बाद विवेचक द्वारा की गई विवेचना को गलत पाया और अपने आदेश में एफआर को निरस्त करते हुए कहा है विवेचना अधिकारी ने सही तथ्यों की निष्पक्ष जांच नहीं की है और अंतिम आख्या प्रेषित कर दी है। कोर्ट के आदेश के बाद अब दोबारा मामले में विवेचना होगी। शैलेंद्र टंडन और राघव नारायण की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
शुभ्राटेक पर क्या आरोप थे, जानें
कुलसचिव केएन सिंह ने वर्ष 2016 में हरीपर्वत थाने में तहरीर दी की वर्ष 2014 के समस्त परीक्षा परिणाम तैयार करने वाली एजेंसी सुभ्राटेक द्वारा परीक्षा परिणाम संबंधी डाटा विश्वविद्यालय को उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। इसके साथ ही एजेंसी का परीक्षा परिणाम तैयार करने का कार्य भी संतोषजनक नहीं था। इसलिए कई बार एजेंसी को नोटिस भी दिए गए। एजेंसी के कार्यों में सुधार न होने के कारण वर्ष 2015 की परीक्षा कार्य नई एजेंसी को देना तय कर लिया गया। 2015 के परीक्षा परिणाम घोषित हो गए हैं और पुरानी एजेंसी के द्वारा डाटा नहीं दिया गया है। इस कारण परीक्षा फॉर्म नहीं भरे जा रहे हैं। यही नहीं एजेंसी अपने कार्य स्थल से भी गायब हो गई है, जिस वजह से कई छात्रों का परीक्षा परिणाम अधर में लटक गया है। डाटा नहीं मिलने के कारण पांच लाख से ऊपर छात्रों के फॉर्म नहीं भरे जा रहे हैं। इसके साथ ही एजेंसी ने छात्रों के परीक्षा परिणाम में भी संशोधन नहीं किया है। एजेंसी द्वारा डाटा नहीं दिया जाना एक आपराधिक कृत्य है। एजेंसी के डाटा नही देने की वजह से आठ जनपदों के महाविद्यालय के छात्र उग्र हो सकते हैं। कोई हिंसा भी संभव है। इससे कानून व्यवस्था भंग हो सकती है। मामले में पुलिस ने प्रशांत गिरी, सुशांत गिरी, मैनेजर अतिरेक द्विवेदी, सुमित कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। विवेचक द्वारा मामले में एफआर लगा दी गई थी। कुलसचिव ने अधिवक्ता अरुण कुमार दीक्षित के माध्यम से कोर्ट में इसे चुनौती दी थी। अधिवक्ता अरुण कुमार दीक्षित ने कोर्ट में अपनी दलील में कहा कि एजेंसी छात्रों का डाटा लेकर भाग गई। इस वजह से छात्रों का भविष्य चौपट हो गया। छात्रों ने विश्वविद्यालय में जमकर प्रदर्शन भी किये। एजेंसी की बजह से विवि की आर्थिक हानि भी हुई। विवेचक पर आरोप लगाया कि उन्होंने आरोपियों के साथ में सांठगांठ कर ली और विवेचना में लीपापोती कर दी। कोर्ट ने एफआर को निरस्त करते हुए पुनः विवेचना करने के आदेश दिए हैं।
एजेंसी पर एफआईआर थी, मामला कोर्ट में था, अधिकारियों ने भुगतान भी कर दिया
आगरा। एजेंसी के खिलाफ किसी और ने नहीं कुलसचिव ने ही एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके बावजूद बाद में आए अधिकारियों ने उसका भुगतान कर दिया। सूत्रों का कहना है कि कमीशन के लालच में यह भुगतान किया गया। भुगतान किए जाने की विजिलेंस के द्वारा भी अलग से एक एफआईआर में जांच की जा रही है। इसमें कई अधिकारी फंस सकते हैं। एक अधिकारी ने विश्वविद्यालय के अधिवक्ता से भी सलाह ली थी कि क्या एजेंसी का भुगतान किया जा सकता है उन्होंने मना कर दिया था। इसके बावजूद भुगतान कर दिया गया है।
माइंडलोजिक्स और सुभ्राटेक एजेंसी के खिलाफ चार्टों में फर्जीवाड़ा करने और छात्रों का डाटा लेकर भागने के संबंध में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। विवेचक ने इसमें एफआर लगा दी थी। कोर्ट ने दलीलों को सुनने के बाद एफआर निरस्त कर दी है। अब पुनः विवेचना के आदेश दिए हैं।
डॉ. अरुण कुमार दीक्षित विश्वविद्यालय अधिवक्ता

माइंडलोजिक्स और सुभ्राटेक एजेंसी के खिलाफ चार्टों में फर्जीवाड़ा करने और छात्रों का डाटा लेकर भागने के संबंध में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। विवेचक ने इसमें एफआर लगा दी थी। कोर्ट ने दलीलों को सुनने के बाद एफआर निरस्त कर दी है। अब पुनः विवेचना के आदेश दिए हैं।









