कोलंबो । भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका गंभीर आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है। कई महीनों के तेल संकट, बिजली कटौती और महंगाई के बाद आखिरकार शनिवार को जनता का गुस्सा फूट गया। हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने देश की प्रमुख इमारतों पर धावा बोल दिया और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के आधिकारिक आवास को अपने कब्जे में ले लिया। राजपक्षे ने घोषणा की है कि 13 जुलाई को वह इस्तीफा दे देंगे। पड़ोसी श्रीलंका को इस संकट से उबारने के लिए भारत करीब 4 अरब डॉलर की मदद दे चुका है। आर्थिक संकट में फंसे श्रीलंका की खुलकर मदद करके भारत की कोशिश चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करना है।
श्रीलंकाई संसद के अध्यक्ष महिंदा यापा अभयवर्धने ने मीडिया को इसकी जानकारी दी है।
प्रदर्शनकारियों ने शनिवार को महिंदा राजपक्षे की तरह रानिल विक्रमसिंघे के घर को भी फूंक दिया जिन्होंने इस्तीफे की पेशकश की है। हिंसा में कम से कम 50 लोग घायल हुए हैं जिसमें पत्रकार और पुलिसकर्मी शामिल हैं। प्रदर्शनकारी अभी भी राष्ट्रपति भवन, राष्ट्रपति सचिवालय और प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास, टेंपल ट्रीज के भीतर मौजूद हैं। उनका कहना है कि जब तक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आधिकारिक तौर पर इस्तीफा नहीं दे देते, वे इमारतों से बाहर नहीं जाएंगे।
श्रीलंका के राष्ट्रपति फरार हैं, प्रधानमंत्री इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं और देश कर्ज में डूबा हुआ है। ये परिस्थितियां श्रीलंका के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रही हैं। आगामी 13 जुलाई को राजपक्षे के इस्तीफे के बाद संसद के स्पीकर की अध्यक्षता वाली सरकार देश में एक राजनीतिक परिवर्तन का नेतृत्व कर सकती है। हालांकि संसद को एक महीने के भीतर एक नए राष्ट्रपति का चुनाव करना होगा। संसद के सदस्यों को किसी ऐसे व्यक्ति का चुनाव करना होगा जो बहुमत सांसदों (113) के समर्थन के साथ-साथ जनता की नजर में भी वैधता हासिल कर सके। राजपक्षे की पार्टी को अभी भी संसद में बहुमत हासिल है। बिना उनके सहयोग के एक विश्वसनीय और वैध सरकार नहीं चुनी जा सकती और ऐसी स्थिति में जनता का प्रदर्शन जारी रह सकता है। श्रीलंका और भारत के बीच लोन पर भी बातचीत हो रही है।
इस बातचीत को जारी रखने के लिए एक कार्यशील सरकार की जरूरत है। आईएमएफ और अन्य देशों ने श्रीलंका से जल्द से जल्द राजनीतिक स्थिरता हासिल करने का आग्रह किया है। एक स्थिर सरकार आईएमएफ समझौते पर बातचीत करने और नीतिगत सिफारिशों को लागू करने की देश की क्षमता में भी मदद करेगी।
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