आगरा। डॉ. भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय के विधिक सलाहकार ने कुलपति सहित कई अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री और राजभवन को इस संबंध में शिकायत की थी। प्रधानमंत्री कार्यालय से शिकायत पर जांच बैठा दी गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय से मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश को जांच सौंपी गई है।
प्रधानमंत्री से की गई शिकायत में उन्होंने यह लिखा है कि प्रधानमंत्री जी के भाषणों में सुना है कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो भ्रष्टाचार जैसी कुरीतियों को जड़ से उखाड़ना होगा। देश की सभी समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए मोदी सरकार ने हर संस्था के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया जो भ्रष्टाचार में लिप्त है। भ्रष्ट राजनेताओं पर शिकंजा कसा जा रहा है। इसके साथ ही रिश्वत लेने वाले अधिकारियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई हो रही है, लेकिन उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार को खुलेआम दबंगई से अंजाम दिया जा रहा है। डॉ. भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय में जिस तरह भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है वह आश्चर्यचकित करने वाला है। उन्होंने पूर्व में कुलाधिपति की ओर से उनकी शिकायत पर कराई गई जांच की रिपोर्ट भी उन्हें भेजी है। इसमें उनके बिलों की भुगतान के लिए कहा गया है। लेकिन विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा उनसे कमीशन मांगा जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि उनके बिलों का भुगतान हो या ना हो मैं रिश्वत नहीं दूंगा। मैं ऐसे परिवार से हूं जहां रिश्वत जैसे मूल्यों का कोई मतलब नहीं है। उनके पिता जज थे। इसके साथ ही उनके परिवार से इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज और एक अन्य यूपी के डीजीपी भी रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि वर्ष 2011 से उन्होंने कोई भी गलत कार्य किया हो, विश्वविद्यालय के खिलाफ कोई विपरीत आदेश पारित हुआ हो या उनके द्वारा जिन वादों की पैरवी की गई है उन वादों में विश्वविद्यालय कोई केस हारा हो तो जो सजा दी जाए। वह उसके लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा है कि सुल्तानगंज कैंपस की जमीन भू माफिया द्वारा कब्जा कर ली गई थी। यह अरबों रुपए की थी। 1990 से इसका सिविल वाद चल रहा था। हाईकोर्ट से विश्वविद्यालय के पक्ष में निर्णय कराया। मौके पर खड़े होकर भूमाफियाओं से यह जमीन मुक्त कराई। इसके साथ ही सत्र 2008-09 में विश्वविद्यालय का खाता कुर्क करके सेल टैक्स ने साढ़े आठ करोड रुपए निकाल लिए थे। यह वापस कराए। बिजली विभाग ने विश्वविद्यालय के ऊपर एक करोड़ 58 लाख की रिकवरी निकाल दी थी। कोर्ट में दलील देकर यह रिकवरी निरस्त कराई। कमर्शियल कोर्ट व जिला जज कोर्ट से विश्वविद्यालय के पक्ष में कई केस जिताए जिससे विश्वविद्यालय को करोड़ों रुपए का लाभ हुआ। उन्होंने अपने पत्र में यह भी कहा है मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि पूर्व की भांति उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई जाती है तो मेरे पास विश्वविद्यालय में हो रहे भ्रष्टाचार के अनगिनत साक्ष्य हैं जिसे देखकर आप अचंभित रह जाएंगे। विश्वविद्यालय के कई कर्मचारी अधिकारी और प्रोफेसर हैं जो विश्वविद्यालय में हो रहे भ्रष्टाचार के संबंध में शपथ पत्र भी देने को तैयार हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुभाग अधिकारी माधव कुमार सिंह ने मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश को जांच सौंपी दी है। जांच शुरू होने पर विश्वविद्यालय में कई की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसके पीछे कारण यह भी है कि पूर्व में कुलाधिपति द्वारा डॉ. दीक्षित की शिकायत पर बनाई गई कमेटी ने उनके भुगतान रोके जाना विधि विरुद्ध पाया था। फिर भी तीन साल में उनके भुगतान नहीं किए गए हैं। अपने बिलों के भुगतान के लिए उन्होंने कुलपति सहित कुलसचिव और उप कुलसचिव को नौ पत्र भी लिखे लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।











