आगरा। नए यूजीसी एक्ट रोलबैक मांग को लेकर आज होने वाले प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस और प्रशासन सुबह से चौकन्ना रहा। नेशनल हाईवे को छावनी में तब्दील कर दिया गया। एत्मादपुर से लेकर कलेक्ट्रेट तक चप्पे- चप्पे पर पुलिस तैनात रही। सुबह 10:00 बजे प्रदर्शनकारी हाईवे की तरफ आगे के लिए बढ़े। इस दौरान पुलिस से उनकी नोकझोंक हुई। पुलिस ने उनके ट्रैक्टर ले जाने पर रोक लगा दी और हाइड्रा से रास्ता जाम कर दिया। इससे प्रदर्शनकारी और ज्यादा भड़क गए। देर शाम उनका हंगामा शांत हुआ।
सिस्टम सुधार संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अंशुमान ठाकुर के नेतृत्व में यूजीसी के नए नियम के विरोध में समाई से लेकर कलेक्ट्रेट तक आज ट्रैक्टर मार्च निकाले जाने का ऐलान किया गया था। 500 ट्रैक्टर में 50 हजार लोग प्रदर्शन में शामिल होंगे, ऐसा दावा किया गया था। भारतीय किसान यूनियन भानु के राष्ट्रीय अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह सहित कई क्षत्रीय समाज के पदाधिकारी और क्षेत्रीय लोगों के द्वारा इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया गया था। गुरुवार को अधिकांश ने अपना समर्थन वापस लेते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से यह अपील की कि वह इस आंदोलन में शामिल नहीं होंगे। इसे स्थगित किया जा रहा है। भारतीय किसान यूनियन भानू ने भी इसे स्थगित कर दिया। इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि पिछली बार करणी सेना के एक आंदोलन में कई युवाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था जिससे उनका भविष्य खराब हो गया। इधर अंशुमान ठाकुर ने देर रात आंदोलन जारी रखने की बात कही और कहा वह ट्रैक्टर मार्च अवश्य निकालेंगे। आज सुबह 10:00 बजे अंशुमान ठाकुर के नेतृत्व में लोग आगे की ओर बढ़े। बाद में कुछ युवा और बुजुर्ग भी आ गए। केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। रास्ते में पुलिस से उनकी नोकझोंक भी हुई। पुलिस प्रशासन उन्हें समझाने का प्रयास करता रहा। पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार से वार्ता होने के बाद अंशुमान ठाकुर ने प्रदर्शन को खत्म कर दिया। कुछ युवक हाईवे पर भी निकलकर आ गए थे जिन्हें पुलिस ने रोक दिया और बस में भरकर ले गई।

समाज के लोगों ने युवाओं के भविष्य को लेकर किया था चिंतन
आज निकलने वाले ट्रैक्टर जुलूस से पहले गुरुवार को फतेहाबाद रोड पर क्षत्रिय समाज व युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर चिंतन भी हुआ। इसमें क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय महासचिव गौरी शंकर सिकरवार ने कहा कि क्षत्रिय समाज अब जागरूक है और किसी के राजनीतिक स्वार्थ का मोहरा बनने को तैयार नहीं है। समाज और नौजवानों के भविष्य को सुरक्षित और संरक्षित होना आवश्यक है। बार-बार देखा गया है कि बाहर से आने वाले कुछ नेता आंदोलन की घोषणा करते हैं, युवाओं को भावनात्मक रूप से उकसाते हैं और फिर वापस चले जाते हैं। लेकिन जब मुकदमे दर्ज होते हैं, पुलिस कार्रवाई होती है और परिवार परेशान होते हैं, तब उन युवाओं के साथ खड़ा कौन होता है, कोई नहीं। पूर्व के आंदोलनों में अनेक नवयुवकों पर दर्ज मुकदमों का आज तक संतोषजनक निराकरण नहीं हुआ है।










