नई जिल्ली। भारत में मंदिर-मस्जिद विवाद नया नहीं है। जब कभी ऐसा होता है, वह सुर्खियों में आ जाता है। अभी वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद पर हंगामा मचा है। हिंदू-मुस्लिम पक्ष के अपने-अपने दावे हैं। हालांकि, इन सबके चलते दोनों समुदाय के लोगों में कटुता बढ़ रही है। उनका लगातार ध्रुवीकरण हो रहा है। ये हालात क्यों बिगड़ते जा रहे हैं? इसका क्या समाधान है? अनमास्किंग इंडियन सेक्युलरिज्म: वाई वी नीड अ न्यू हिंदू-मुस्लिम डील के लेखक हसन सुरूर ने इस पर अपनी राय रखी है। उन्होंने ब्रिटिश मॉडल को अपनाने की बात कही है। वह मानते हैं कि हकीकत का सामना करना होगा। उन्होंने भारत में हिंदू धर्म को आफिशियल रिलीजन के तौर पर मान्यता देने की बात कही है। सुरूर के मुताबिक, ब्रिटेन ईसाई मुल्क है। हालांकि, धर्म और जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है। ब्रिटिश नागरिक के तौर पर वह यह देख रहे हैं। इसने काम किया है। उन्होंने भारत में धर्मनिरपेक्षता का मॉडल फेल होने की बात कही है।
हसन सुरूर ने इसे लेकर अंग्रेजी के एक अखबार में लेख लिखा है। उन्होंने लिखा है कि मंदिर- मस्जिद विवाद फिर से सामने आने लगे हैं। प्लेसेज आफ वर्शिप ऐक्ट 1991 का जिक्र कर सुरूर ने कहा कि इसकी मंशा थी कि इससे आगे विवादों पर रोक लगाई जा सकेगी। यह कानून किसी धार्मिक स्थल के चरित्र को बदलने की कोशिश पर रोक लगाता है। इसके अनुसार, 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जैसा था वैसा ही रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में फैसला सुनाते हुए साफ किया था कि अन्य धार्मिक ढांचों के ऐतिहासिक विवाद के संबंध में वह ऐसी याचिकाओं को स्वीकार नहीं करेगा। सुरूर के मुताबिक, हिंदू-मुस्लिम संबंध बहुत निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। इनमें उकसावे की हर गतिविधि स्वीकार हो रही है। बाबरी-राम मंदिर विवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें दोनों ओर से भावनाओं को भड़काने वाले थे।
ऐसा क्या हुआ कि सेक्युलरिज्म फेल हुआ? कैसे किसी के ध्यान में आए बगैर भारतीयता बहुसंख्यकवाद में तब्दील हो गई? हम यहां तक कैसे पहुंच गए? इन सवालों को उठाते हुए सुरूर ने इनके जवाब दिए। लेखक ने कहा कि इन सवालों पर आत्मचिंतन की जरूरत है। इसमें नेता, दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी, मुस्लिम लीडरशिप सभी को सोचने की जरूरत है। उन्होंने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को क्लासिक केस बताया जिसकी मंशा अच्छी थी लेकिन गलत आचरणों से यह सोच पटरी से उतर गई।











