-गौरव प्रताप सिंह-
आगरा। आगरा कमिश्नरेट में जिन-जिन मामलों में सिपाही- दीवान से ऊपर बड़ी रैंक के पुलिसकर्मी फंसे हुए हैं वह सभी ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं। इन सभी मामलों में कार्रवाई के नाम पर सिर्फ लीपापोती हो रही है, उसके अलावा कुछ नहीं। सवाल यह उठ रहे हैं कि पुलिसकर्मी अगर कोई कांड कर देता है तो क्या उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या आगरा कमिश्नरेट में कानून आमजन के लिए अलग और पुलिसकर्मी के लिए अलग है?
बीते दो सालों के मामलों पर नजर डालें तो कई ऐसे मामले हैं जिनमें पुलिस कर्मियों की चल रही जांच एक पहेली बन गई है। जिन- जिन मामलों में पुलिसकर्मियों पर आरोप सिद्ध हो रहे हैं वह सभी मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं। पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई तो दूर की बात है, मेहरबानी ज्यादा दिखाई दे रही है। आगरा कमिश्नरेट के अब उन मामलों पर नजर डालते हैं जिनमें चार मुकदमों में पुलिसकर्मी फंसे हुए हैं और उन मामलों में कोई कार्रवाई नहीं हो रही। कुछ में जांच ही आगे नहीं बढ़ पा रही।
केस नंबर- 1
सटोरिया सनी कबाड़िया ने अमित और जितेंद्र नाम के व्यक्तियों को फर्जी तरीके से फसाने के लिए जगदीशपुरा थाने के पुलिसकर्मियों को पैसे दिए थे। इन पुलिसकर्मियों ने रावत पेट्रोल पंप से दोनों को उठा लिया। उठाने के बाद उनसे छोड़ने के नाम पर पांच लाख रुपये मांगे। दोनों ने उन्हें 5 लाख रुपये दे दिए। इसके बाद भी पुलिसकर्मियों ने दोनों को अवैध तरीके से नशीले पदार्थ में जेल भेज दिया। दोनों ने अधिकारियों से शिकायत की।
दोषी पाए जाने पर जगदीशपुरा थाने के एसआई ऋषि पाल सिंह, मनोज कुमार, अर्जुन प्रताप सिंह, कॉन्स्टेबल राजीव कुमार, दीपक राणा, गौरव डांगर, जितेंद्र और अमित कुमार को निलंबित कर दिया गया था। इंस्पेक्टर पीके सिंह को लाइन हाजिर किया गया था। मुकदमे में पुलिस ने चार्जशीट लगा दी थी। सच्चाई सामने आने के बाद पुनः विवेचना हो रही है। विवेचना का निस्तारण नहीं किया जा रहा। पुलिस कमिश्नर जे रविंदर गौड ने बीते दिनों अधिकारियों के साथ हुई मीटिंग में कहा है 29 फरवरी 2024 से पहले की विवेचना का निस्तारण एक महीने में कर दिया जाए। यह विवेचना भी 29 फरवरी 2024 से पहले की है। क्या इसका एक महीने में निस्तारण हो जाएगा?
केस- 2
जगदीशपुरा क्षेत्र में 50 करोड़ रुपये की जमीन पर कब्जा कराने के लिए पुलिस ने दो भाइयों के परिवार को झूठे मुकदमों में फंसा कर जेल भेज दिया। पहले गांजे के मुकदमे में सगे भाइयों को जेल भेजा, फिर अवैध शराब बनाने का मामला बनाकर भाभी और ननद को जेल भेज दिया। परिवार को जेल भेजे जाने के बाद पुलिस की शह पर बैनारा फैक्ट्री के पास स्थित चार बीघा जमीन पर कब्जा कर लिया गया। बाउंड्रीवाल पर गेट लगाकर सीसीटीवी कैमरे भी लगा दिए गए। परिवार ने बाहर आने के बाद शिकायत की तो पुलिस कमिश्नर ने दोनों मुकदमे फर्जी घोषित किए। इसके बाद दोनों विवेचना आबकारी और गांजे वाली पुनः हो रही हैं।
क्योंकि पुलिसकर्मी फंस रहे हैं, इसलिए दोनों ही विवेचना ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं। दरोगा अमित धामा ने उसमें सिर्फ एक विवेचना ग्रहण का ही पर्चा काटा है। पुलिस फंस रही है। इसलिए विवेचना ठंडे बस्ते में है, जबकि पहले जब निर्दोष जेल भेजे थे तो दरोगा आशीष त्यागी ने 21 दिन में ही चार्जशीट लगा दी थी। यह विवेचना भी 29 फरवरी 2024 से पहले की है। क्या इसका एक महीने में निस्तारण हो जाएगा? हैरानी की बात यह है कि जिस दरोगा आशीष कुमार त्यागी ने गांजे वाली विवेचना में 21 दिन में फर्जी चार्जशीट लगाई थी। वह एक के बाद एक बढ़िया चौकी पा रहा है। जिस दरोगा शक्ति राठी ने 100 दिन तक पीड़ित के प्रार्थना पत्र का निस्तारण नहीं किया था वह एसएसआई बना हुआ है। जिस दरोगा अनुज फौगाट ने फर्जी शराब पकड़ने की कहानी रची वह तो जिले से ही बाहर चला गया और कोई कार्रवाई नहीं हुई।
केस- 3
नगला शेख, सादाबाद, हाथरस निवासी आईटीबीपी के जवान सूरज की पत्नी की 9 मार्च को अलीगढ़ मार्ग पर आलू से लदे ट्रैक्टर ट्राला की चपेट में आकर मौत हो गई थी। सूरज के भाई धीरज ने थाना खंदौली में चालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। पुलिस ने टक्कर मारने वाले ट्रैक्टर ट्रॉली को हटवाकर दूसरा ट्रैक्टर खड़ा करा दिया।
मामला तूल पकड़ा तो सिपाही प्रवीण कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया। सिपाही ने इंटरनेट मीडिया पर वीडियो शेयर कर आरोप लगाए। कहा कि मामला एसओ राजीव सोलंकी का था। एक सिपाही की इतनी हैसियत नहीं है कि एक ट्रैक्टर को चेंज कर सके बिना विवेचक और एसओ के। उसे बलि का बकरा बनाया जा रहा है। वीडियो वायरल होने के बाद एसीपी एलआईयू को भी जांच के लिए थाने में भेजा गया था। जांच में पाया गया था कि मुकदमा बाद में दर्ज हुआ था ट्रैक्टर चालक से जमानती नोटिस पहले ही भरवा लिया गया था। थानाध्यक्ष राजीव सोलंकी गाजियाबाद ट्रांसफर होकर भी चले गए हैं। सिपाही अभी भी फंसा हुआ है उसके खिलाफ मुकदमा कायम है। क्या इस मुकदमे का भी पुलिस जल्द निस्तारण कर पाएगी यह बड़ा सवाल है।
केस- 4
आवास विकास कालोनी सेक्टर 12 बी निवासी बनवारी ने शिकायत की थी कि 14 अक्तूबर 2023 को देहरादून से बड़े भाई का उसके पास फोन आया। बताया कि गांव नगला मुरली, रुनकता में पिता वीरेंद्र सिंह और परिवार की महिलाओं के साथ कुछ लोगों ने मारपीट की है। उस समय वह गुरुद्वारे के पास था। उसने 112 नंबर पर फोन किया। मदद नहीं मिली तो रुनकता चौकी पर गया। वहां सुनवाई नहीं होने पर वह सिकंदरा थाने आया। पुलिस ने सुनवाई की बजाए उसे ही थाने में बैठा लिया। पिता और एक भाई भी साथ थे। छोड़ने के एवज में उससे 30 हजार रुपये रिश्वत मांगी गई। रिश्वत का आरोप तत्कालीन इंस्पेक्टर और महिला कांस्टेबल पर लगाया। शिकायत में कहा कि उसके पिता पर उस समय महज दस हजार रुपये थे। उसने थाने के अंदर ही क्रेडिट कार्ड पर लोन लिया। ऑन लाइन रकम अपने दोस्त को ट्रांसफर की। वह अपने एटीएम से रुपये निकालकर लेकर आया। रात में दो बजे 30 हजार रुपये लेकर पुलिस ने उसे छोड़ा।
शिकायत पर प्रारंभिक जांच एसीपी ताज सुरक्षा सैयद अरीब अहमद को दी गई थी। उन्होंने अपनी जांच में तत्कालीन और महिला आरक्षी को दोषी पाया था। विभागीय जांच एसीपी लोहामंडी मयंक तिवारी को दी गई। उन्होंने महिला आरक्षी को रिश्वत लेने के आरोप में दोषी पाया है। इंस्पेक्टर को क्लीन चिट दे दी गई है। सवाल यह खड़े हो रहे हैं कि भला महिला सिपाही की इतनी मजाल कहां है कि वह किसी आरोपी को थाने से छोड़ सके। क्या वह थाना प्रभारी से ऊपर थी। इधर जिस महिला कांस्टेबल को दोषी माना गया है उसे पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है वह थाने में ही है।
केस- 5
एक रील वायरल हुई थी, जिसमें गाड़ी के डैशबोर्ड पर नोटों की कई गड्डियां पड़ी हुई दिखाई दे रही थीं। गाना बज रहा था छोरी चिल्लावे पैसा ही पैसा। चर्चाएं थी कि थानाध्यक्ष अनिल शर्मा का कारखास बैग लेकर गया था, उसमें से कुछ गड्डियां निकाल कर डैशबोर्ड पर रखी गई थी और रील बनाई गई थी। मामला सुर्खियों में आने के बाद पुलिस कमिश्नर ने एसीपी फतेहाबाद आनंद पांडे को जांच दी थी। एसीपी फतेहाबाद आनंद पांडे की जांच में यह सामने आया था कि दरोगा नितिन की गाड़ी को कारखास सुमित गुर्जर और एक प्राइवेट व्यक्ति सतीश ले गए थे। इसके बाद दरोगा को निलंबित कर दिया गया था। सिपाही को लाइन हाजिर। लेकिन थानाध्यक्ष अनिल शर्मा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। जबकि दरोगा ने बयान में बताया था कि कांस्टेबल उनकी गाड़ी मांगने आया था और कहा था कि थानाध्यक्ष अनिल शर्मा का यह थैला एनसीआर क्षेत्र में जाना है। दरोगा ने जब पूछा इसमें क्या है तो उसने बताया था इसमें 27 लाख रुपए हैं। यही देने के लिए जा रहा हूं। उसने अपनी गाड़ी यह सोच कर दे दी कि वह नहीं देंगे तो थानाध्यक्ष बुरा मान जाएंगे। इधर थानाध्यक्ष को एसीपी ने बयान देने के लिए बुलाया और पूछा कि आपने थैला भेजा था या नहीं? इस पर उन्होंने कहा था कि उन्होंने थैले में अपने रिश्तेदारों के पास कपड़े भेजे थे। तत्कालीन एसीपी ने कहा कि भला ऐसे कैसे हो सकता है यहां से कपड़े एनसीआर में भेजे जा रहे हैं। इसका उन्होंने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था और अधूरा जवाब देने के बाद वहां से चले गए थे। एसीपी आनंद पांडे ने उनको नोटिस देकर उनसे उन रिश्तेदारों का नाम पूछा था जिनके पास थैला गया था। वह यहीं तक जांच कर पाए थे। इसी दौरान डीसीपी ने अपना तबादला होने वाले दिन जांच एसीपी पिनाहट अमरदीप सिंह को दे दी। इधर एसीपी पिनाहट ने जांच में थानाध्यक्ष को दोषी माना था। इसके बाद भी उनके खिलाफ निलंबन की कार्रवाई नहीं हुई। उनकी 14 (1) की जांच चल रही है फिर भी वह चौकी प्रभारी बने हुए हैं। एक के बाद एक उन्हें चौकी मिल रही है। नुनिहाई के बाद उन्हें एत्मादपुर की हाईवे चौकी का प्रभारी बना दिया गया है।
मामले में दरोगा नितिन को निलंबित कर दिया गया था। उसका दोष इतना था उसने अपनी गाड़ी दी थी सिपाही को लाइन हाजिर कर दिया गया था उसका दोष इतना था वह उनका थैला लेकर गया था। लेकिन जिनका थैला लेकर गया था वह आज तक कार्रवाई से दूर हैं।
जो विवेचनाएं पेंडिंग में हैं उनके निस्तारण के संबंध में अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं। समय सीमा भी तय कर दी गई है। कानून सभी के लिए बराबर है।
जे रविंदर गौड, पुलिस कमिश्नर












