-गौरव प्रताप सिंह-
आगरा। पुलिस जब किसी मामले में फसती है तो बचाव भी पहले ही ढूंढ लेती है। जो धाराएं अपराध करने पर लगती हैं वह क्या पुलिस कर्मियों पर लागू नहीं हैं? यह सवाल खंदौली थाने में ट्रैक्टर वाले मामले में दर्ज हुए मुकदमे में खड़े हो रहे हैं। जिस धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है वह सिर्फ कर्तव्य की उपेक्षा के लिए है। जबकि जिस मानसिकता से ट्रैक्टर बदला गया है वह धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार अधिनियम, षड्यंत्र और साक्ष्य नष्ट करने की धाराओं में आता है।
आगरा कमिश्नरेट में एक के बाद एक कांड हो रहे हैं। पुलिस सामान्य धारा में मुकदमा दर्ज कर बचने के प्रयास करती है। खंदौली वाले मामले में सैनिक की पत्नी का जिस ट्रैक्टर से हादसे में निधन हुआ उस ट्रैक्टर को थाना पुलिस ने बदल दिया। मामले में शासन को ट्वीट होने के बाद एसीपी एत्मादपुर ने जांच की और तथ्य सही पाए। पुलिस की ओर से मुकदमा तो दर्ज किया गया लेकिन यह मुकदमा पुलिस अधिनियम 1861 धारा 29 के तहत ही दर्ज हुआ। यह धारा में कर्तव्य की उपेक्षा के लिए ही है। जबकि जिस ट्रैक्टर से हादसा हुआ था पुलिस ने उसे सबूत के तौर पर नष्ट कर दिया। इसका टेक्निकल मुआयना नहीं हुआ। उसके लिए धारा 201 बनती है। इसके अलावा खुद को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से पुलिस ने ट्रैक्टर को बदला। इसके लिए धारा 420 बनती है। लेनदेन कर ट्रैक्टर को छोड़ा गया है तो भ्रष्टाचार अधिनियम की भी धारा 7/13 अंकित होनी चाहिए, वह भी नहीं है। इसके साथ ही जब ट्रैक्टर थाना परिसर में आ गया तो इसे हेड मोहर्रिर ने अपनी सुपुर्दगी में क्यों नहीं लिया? जिस विवेचक को विवेचना मिली उसने जीडी पर क्यों दाखिल नहीं किया? अगर यह दाखिल नहीं हुआ तो थानाध्यक्ष ने क्या मॉनिटरिंग की? इसके लिए धारा 342 बनती है। पुलिस ने इन धाराओं में मुकदमा दर्ज न कर एक मामूली सी धारा में मुकदमा दर्ज कर लिया है। ट्रैक्टर मालिक भी षड्यंत्र में शामिल रहा है। उसके खिलाफ भी 120 बी की धारा दर्ज होनी चाहिए थी वह भी नहीं है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि मुख्य किरदार का ही इसमें दिमाग चला है। उसने सोचा है कि अगर वह फसा तो बाद में बच जाएगा। पूर्व में भी यह बड़े-बड़े कांड कर चुका है। इधर सवाल यह भी खड़े हो रहे हैं कि एसीपी एत्मादपुर ने जब मामले में जांच की है और थाना पुलिस की मामले में पूरे तरीके से मिली भगत थी तो थानाध्यक्ष मुकदमा क्यों दर्ज करा रहे हैं।











