नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से एक बार फिर साफ हो गया है कि भाजपा को सीधी चुनौती देने में विपक्ष फेल है। पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी और भाजपा के नेता पहले से ही मानकर चल रहे थे कि उनका बहुत कुछ दांव पर नहीं है। ऐसे में वहां आम आदमी पार्टी की जीत भाजपा पर असर नहीं डालती। कांग्रेस की यूपी समेत तमाम राज्यों में जो दुर्दशा हुई है, उसने पार्टी के अस्तित्व पर ही खतरा पैदा कर दिया है। एक बार फिर नेतृत्व में बदलाव और गैर-गांधी को कमान सौंपने की बातें होने लगी हैं। 2024 में लोकसभा चुनाव हैं और इसी साल गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। गुजरात पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है। ऐसे में यहां जीत हार भाजपा और विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक रूप से काफी असर डालेंगे। ऐंटी-बीजेपी मोर्चा इसके दो साल बाद होने वाले इम्तिहान की तैयारियों में जुट गया है।
2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से ही कांग्रेस से राहुल-सोनिया गांधी, टीएमसी की ममता बनर्जी, हाल-फिलहाल टीआरएस के के. चंद्रशेखर राव ने विपक्षी एकजुटता की कोशिश की है। अब तक के प्रयास तो बेअसर रहे हैं। फरवरी में तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने कहा था कि अगले दो महीने के भीतर दिल्ली में सभी गैर-बीजेपी दलों के सीएम का सम्मेलन बुलाया जाएगा। दरअसल, सभी 10 मार्च को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों का इंतजार कर रहे थे। अब गैर-बीजेपी, गैर-कांग्रेसी मोर्चा बनाने की फिर से पहल होती दिख रही है। इसमें कई मुख्यमंत्री भी शामिल होने वाले हैं। बताया जा रहा है कि 10 सियासी दल नई तैयारी कर रहे हैं। इस फ्रंट में बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, तेलंगाना के सीएम के. चंद्रशेखर, महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन मुख्य भूमिका में दिख सकते हैं। सबसे विषम परिस्थिति कांग्रेस के सामने है। एक तरफ उसके भीतर नेताओं में हताशा और निराशा का आलम है तो पार्टी को 2024 के लिए भी कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।
इस विरोधी मोर्चे में ममता, स्टालिन, राव, ठाकरे के अलावा झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, वाईएसआर कांग्रेस के चीफ जगनमोहन रेड्डी, बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक, सीपीएम के नेता केरल के सीएम पी. विजयन साथ आ सकते हैं। इनमें से लगभग सभी पार्टियां भाजपा की विरोधी होने के साथ ही कांग्रेस से भी दूर हैं। भाजपा के चुनावी प्रदर्शन को देखते हुए इन गैर-कांग्रेसी पार्टियों को लग रहा है कि फिलहाल कांग्रेस विपक्षी मोर्चे का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं है और न ही जनता में उसका कोई क्रेज बचा है। हालांकि विपक्षी मोर्चे की अगुआई कौन करेगा, यह बड़ा सवाल होगा। वैसे भी आम धारणा रहती है कि हिंदीभाषी नेता को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया जाता है।
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