-गौरव प्रताप सिंह-
आगरा। सीखने की ना तो कोई उम्र होती है ना ही कोई पद होता है। व्यक्ति को हर रोज कुछ ना कुछ नया सीखना चाहिए। मुझे भी सीखने को मिलता है तो मैं सीखने की कोशिश करता हूं। यह कहना था प्रशासनिक जज न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला का। मौका था पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए ‘अवधारणा और मध्यस्थता की तकनीक’ पर आईईटी में आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन के अवसर का। दो दिन तक चले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में कई जनपदों के परिवार न्यायालय के न्यायाधीश लाभान्वित हुए।
बता दें कि शनिवार सुबह प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ चीफ जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर के मार्गदर्शन में प्रशासनिक जज न्यायमूर्ति अश्विनी मिश्रा और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला द्वारा किया गया था। पहले और दूसरे दिन चले प्रशिक्षण कार्यक्रम में परिवार न्यायालय के न्यायाधीशों को यह सिखाया गया कि पति और पत्नी के बीच टूट रहे रिश्तो को उन्हें मध्यस्थता कराकर किस प्रकार बचाना है।

रविवार को प्रशिक्षण कार्यक्रम में हाईकोर्ट से आईं मध्यस्थता परीक्षण विशेषज्ञ जयलक्ष्मी सिन्हा ने परिवार न्यायालय के न्यायाधीशों को कहा कि समझौता इस प्रकार कराएं कि दोनों पक्ष संतुष्ट हो जाएं। न्यायाधीशों को दोनों पक्ष के दुख दर्द को समझना चाहिए। कभी-कभी उनके सामने ऐसे जोड़े आ जाते हैं जो कुछ भी बोलने को तैयार नहीं होते। वह बस एक ही बात बोलते हैं। हम दोनों को एक दूसरे के साथ नहीं रहना है। ऐसे में आपको कैसे उनके दर्द को जानना है। यह भी एक कला है। उन्होंने एक उदाहरण भी दिया उन्होंने बताया कि एक बार मेरे सामने एक पति और पत्नी का मामला आया था। पत्नी बोली कि अगर मेरा पति मुझसे माफी मांग ले तो मैं उसे माफ कर दूंगी और उसके साथ रहने के लिए चली जाऊंगी। पति माफी मांगने के लिए तैयार हो गया। जब पति ने माफी मांगी तो पत्नी ने उसे पीटना शुरू कर दिया। सुरक्षाकर्मियों को बुलाकर उन्हें माहौल शांत करना पड़ा। इसलिए सबसे पहले हमें व्यक्ति को समस्या से अलग करना है। समस्या क्यों हुई है। यह जानने का प्रयास करना है।

अगर हम समस्या को समझ जाएंगे तो उनका समझौता भी बेहतर तरीके से करा देंगे। उन्होंने कुछ टिप्स भी दिए। उन्होंने कहा कि हमें बोलना कम है और सुनना ज्यादा है। हमें इमोशनल नहीं होना है। समस्या कहां है यह देखना है। इसके साथ ही समझौता कराने के लिए दो प्लान रखने चाहिए। अगर पहला प्लान काम ना करे तो दूसरे प्लान से कामयाबी हासिल करनी चाहिए। उन्होंने एक और उदाहरण दिया उन्होंने कहा कि एक पति और पत्नी के बीच में कुत्तों को लेकर लड़ाई हो गई थी। पति बोला था कि 6 कुत्ते घर में गंदगी फैलाते हैं। इन्हें बाहर निकाल दो। पत्नी इस बात पर तैयार नहीं हुई और दोनों के बीच में झगड़ा इस कदर बढ़ गया कि दोनों एक-दूसरे के साथ रहने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। दोनों के बीच में इस प्रकार मध्यस्था कराई गई कि वह मान गए।
विशेषज्ञ नीरज उपाध्याय ने कहा कि मध्यस्थता कराते समय आपको अपनी वाणी मधुर रखनी है। इसके साथ ही आपको पूरी प्रक्रिया के दौरान तटस्थ रहना है। कुछ न्यायाधीश बात करने में विफल हो जाते हैं। उन्हें उन्होंने वह टेक्निक सिखाए जिससे वह विफल ना हो। विशेषज्ञ अनूप कुमार श्रीवास्तव ने न्यायाधीशों को संचार के प्रकार बताए। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता कराते समय आपको दोनों पक्षों की बॉडी लैंग्वेज को अच्छी तरीके से नोटिस करना है। इसके साथ ही उनके शब्दों पर भी ध्यान देना है। इमोशन की तरफ आकर्षित नहीं होना है। आपको सूझबूझ से इस प्रकार मध्यस्थता करानी है कि दोनों पक्षों में सुलह हो जाए। विशेषज्ञ संदीप सक्सेना ने कहा कि कई बार ऐसे मामले आ जाते हैं कि पत्नी अड़ जाती है कि मैं आधा हिस्सा ही लूंगी, तब मानूंगी। न्यायाधीश को दोनों का इंटरेस्ट वॉच करना है। ऐसे में उन्हें किस तरीके से मध्यस्थता करानी है। इसके लिए उन्होंने न्यायाधीशों को कई टिप्स दिए।

दूसरे दिन भी एक नाटक का मंचन किया गया। इसमें न्यायाधीशों को किरदार निभाने के लिए कहा गया। जो कहानी थी उसमें सुधीर नाम के व्यक्ति की शादी मीना से लगभग 11 साल पहले हुई थी, उनका 6 वर्षीय बेटा और 10 वर्षीय बेटी भी है। मीना का कोई भाई नहीं है, उसके माता-पिता अकेले रहते हैं, उनकी तबीयत खराब होने पर आए दिन उनके पास देखभाल के लिए मायके चली जाती है। इस बात से पति काफी नाराज हो गया। पति ने तलाक के लिए याचिका दाखिल कर दी।

तीन अलग-अलग जगहों पर सुधीर और मीना के रूप में न्यायाधीशों को बैठाया गया। अधिवक्ता के रूप में और मध्यस्थता कराने के लिए न्यायाधीश ने अपना रोल अदा किया। मध्यस्थता के दौरान इस बात पर दोनों पति-पत्नी एक साथ रहने को तैयार हुए की पत्नी की मां और पिता भी उनके साथ रहेंगे। इसके बाद वह मायके नहीं जाएगी। इस नाटक में प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट विपिन कुमार, प्रिंसिपल जज अलीगढ़ अहमद उल्लाह खान, प्रिंसिपल जज मैनपुरी मोहम्मद गुलामूल मदर और अपर जिला जज पारुल पवार का किरदार सबसे बेहतर रहा।

कार्यक्रम के समापन के अवसर पर प्रशासनिक जज न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला ने न्यायाधीशों का मार्गदर्शन किया। इसके साथ ही उन्होंने आगरा, अलीगढ़, औरैया, बदायूं, एटा, इटावा, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद, हाथरस, कन्नौज, कासगंज, मैनपुरी और मथुरा के परिवार न्यायालय के प्रिंसिपल जज और एडिशनल प्रिंसिपल जज को प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रतिभाग करने के लिए सर्टिफिकेट दिया। न्यायमूर्ति ने कहा कि दो दिन तक चले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम से आप काफी लाभान्वित हुए होंगे। न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि मध्यस्थता कराते समय आपके फेस पर स्माइल होनी चाहिए। अगर आप रुखे रहेंगे तो दोनों पार्टी की मध्यस्थता कराना कठिन रहेगा। न्यायमूर्ति को प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट द्वारा एक पौधा भी भेंट किया गया। इसके साथ ही सभी न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति जस्टिस सुनीता अग्रवाल और हाईकोर्ट से आए विशेषज्ञों का आभार जताया।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट विपिन कुमार ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रम में सभी न्यायाधीशों को बहुत कुछ सीखने को मिला है, उन्हें अपना व्यवहार कैसा रखना है। किस तरीके से मध्यस्थता करानी है। यह बेहतर तरीके से समझ में आ गया है।
प्रशिक्षण शिविर के दौरान जिला जज विवेक संगल, प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट विपिन कुमार, अपर जिला जज विनोद कुमार बरनवाल, रविकांत रस्तोगी, रवि करण सिंह, नीरज गौतम, प्रमेंद्र कुमार, परवेज अख्तर, नीरज बख्शी, कनिष्क सिंह, दिव्यानंद, रणवीर सिंह, प्रतिभा सक्सेना, पारुल पवार, प्रदीप कुमार मिश्रा, असीफा राणा, काशीनाथ सिंह, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मृत्युंजय श्रीवास्तव, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुमित चौधरी, अजय कुमार, जुडिशल मजिस्ट्रेट मयूरेश श्रीवास्तव, विश्वविद्यालय के विधिक सलाहकार डॉ. अरुण कुमार दीक्षित, सेक्शन ऑफिसर अभिषेक श्रीवास्तव, रिव्यु ऑफिसर साक्षी मित्तल, निदेशक आईईटी प्रोफेसर वीके सारस्वत, गौरव प्रताप सिंह आदि शामिल रहे।











